
आज 31 जुलाई को हिंदी कथा-साहित्य के युगपुरुष मुंशी प्रेमचंद की जयंती के पावन अवसर पर हम उन्हें सादर स्मरण करते हैं। सन् 1880 में वाराणसी के समीप लमही ग्राम में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव, जिन्होंने कालान्तर में ‘प्रेमचंद’ के नाम से साहित्य-जगत् में अमर स्थान प्राप्त किया, सामान्य जन-जीवन के यथार्थ चित्रण के प्रतीक हैं। उनका जीवन संघर्ष, स्वाभिमान, संवेदनशीलता और साहित्य-सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। आज उनकी जयंती पर उनके जीवन के कुछ रोचक प्रसंगों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व की झलक देखना तथा उनके साहित्यिक अवदान का स्मरण करना अत्यंत प्रासंगिक है।

ऋषभचरण और जैनेन्द्र कुमार के साथ प्रेमचंद। स्रोत: प्रेमचंद: कलम का सिपाही, अमृत राय, 1962 संस्करण
प्रेमचंद का बचपन अभावों और कठिनाइयों से भरा हुआ था। माता आनंदी देवी का स्वर्गवास तब हो गया जब वे मात्र सात-आठ वर्ष के थे। पिता मुंशी अजायब राय डाक विभाग में साधारण कर्मचारी थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। इन परिस्थितियों में भी बालक धनपत राय में नटखटपन और भोलापन दोनों विद्यमान थे। उनके बचपन का एक रोचक प्रसंग उनके व्यक्तित्व की प्रारंभिक झलक प्रस्तुत करता है।

एक बार मोहल्ले के बालक ‘नाई-नाई’ का खेल खेल रहे थे। छोटे धनपत राय ने नाई की भूमिका निभाई। वे बांस की तीखी कमानी को उस्तरा बनाकर एक साथी की हजामत बनाने लगे। खेल के उत्साह में कमानी से वार करते हुए गलती से उस बालक के कान का किनारा कट गया और रक्त बहने लगा। बालक रोता हुआ अपनी माता के पास पहुँचा। माता ने रक्त बहते कान को देखकर क्रोधित होकर प्रेमचंद की माता के पास शिकायत लेकर आईं। प्रेमचंद ने जैसे ही आवाज़ सुनी, खिड़की के पास दुबक गए। माता ने उन्हें खोज निकाला और पकड़कर कई झापड़ दिए। तत्पश्चात् उन्होंने पूछा, “तूने उस लड़के का कान क्यों काटा?” प्रेमचंद ने अत्यंत भोलेपन से उत्तर दिया, “मैंने तो केवल उसकी हजामत बनाई थी। सब इसी प्रकार खेल रहे थे।” माता ने उन्हें समझाया कि अब ऐसा खेल न खेलें। यह प्रसंग उनके बालसुलभ भोलेपन, शरारत और निर्दोष स्वभाव को स्पष्ट करता है। अमृत राय द्वारा रचित जीवनी ‘कलम का सिपाही’ तथा शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में’ में इस घटना का उल्लेख मिलता है। बचपन की ये छोटी-छोटी घटनाएँ आगे चलकर उनके लेखन में आम आदमी के जीवन की सूक्ष्मताओं को समझने का आधार बनीं।
वयस्क होने पर भी प्रेमचंद का स्वाभिमान अखंड रहा। शिक्षा विभाग में अध्यापक तथा बाद में डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत रहते हुए उनका एक अन्य प्रसंग उनके आत्मसम्मान को उजागर करता है। जाड़े के दिनों में एक बार स्कूल-इंस्पेक्टर मुआयना करने आए। कार्यावधि में प्रेमचंद ने उन्हें विद्यालय दिखाया। विद्यालय की छुट्टी के पश्चात् जब वे घर लौटे और आराम कुर्सी पर लेटे अखबार पढ़ रहे थे, तभी इंस्पेक्टर उनके निवास के समीप से गुजरे। प्रेमचंद ने उठकर सलाम नहीं किया। इंस्पेक्टर नाराज हो गए। बाद में उन्होंने प्रेमचंद को बुलाकर कहा, “तुमने मुझे देखते हुए भी सलाम नहीं किया। यह बात घमंड की परिचायक है।” इस पर प्रेमचंद ने शांत किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया “जब मैं विद्यालय में रहता हूँ, तब तक ही सेवक हूँ। उसके पश्चात् अपने घर का स्वामी हूँ।” यह उत्तर उनके स्वाभिमान, गरिमा और स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है। वे कभी भी अपनी आत्मसम्मान की भावना से समझौता करने को तैयार नहीं थे। शिवरानी देवी की स्मृतियों में भी ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जो उनके निजी जीवन की सादगी और दृढ़ता को दर्शाते हैं।
प्रेमचंद का जीवन केवल इन प्रसंगों तक सीमित नहीं था। उन्होंने गरीबी और अभाव के बीच शिक्षा प्राप्त की। ट्यूशन पढ़ाकर परिवार का भरण-पोषण किया। बाद में शिक्षा विभाग में नौकरी की, परंतु महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर सरकारी सेवा त्याग दी और पूर्ण रूप से साहित्य-सेवा में समर्पित हो गए। उनकी रचनाएँ समाज की कुरीतियों, किसान-मजदूर की व्यथा, नारी की पीड़ा, जाति-व्यवस्था तथा आर्थिक शोषण को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करती हैं। ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’, ‘निर्मला’, ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’ जैसे उपन्यास तथा ‘कफन’, ‘ईदगाह’, ‘पूस की रात’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘पंच परमेश्वर’ जैसी कहानियाँ आज भी साहित्यिक एवं सामाजिक दृष्टि से समान रूप से प्रासंगिक हैं। उन्होंने साहित्य को मात्र मनोरंजन का साधन न बनाकर समाज-सुधार का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और जन-सामान्य के निकट थी, जिससे वे सीधे पाठकों के हृदय तक पहुँचे।
प्रेमचंद ने उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं में लेखन किया। आरंभ में वे ‘नवाब राय’ के नाम से लिखते थे। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत उनकी कृति ‘सोजे-वतन’ पर प्रतिबंध लगा तथा उन्हें चेतावनी दी गई, परंतु उन्होंने अपना मार्ग नहीं बदला। जीवन के अंतिम वर्षों में भी वे निरंतर लेखन करते रहे। अधूरा उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ उनके असमय निधन का साक्षी है। 8 अक्टूबर 1936 को उनका देहावसान हुआ।
आज उनकी जयंती पर हम केवल उनके जन्मदिन का औपचारिक स्मरण नहीं करते, बल्कि उनके द्वारा स्थापित यथार्थवादी परंपरा, मानवीय संवेदना और सामाजिक चेतना के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। उनके जीवन के उपरोक्त प्रसंग हमें यह सिखाते हैं कि भोलापन और स्वाभिमान दोनों एक साथ रह सकते हैं। बालसुलभ शरारत में भी निर्दोषता हो सकती है तथा पद और अधिकार के बीच भी आत्मसम्मान की रक्षा संभव है। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि साहित्यकार का धर्म समाज की सच्चाई को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करना है।
हमारे देश में साहित्यिक परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। प्रेमचंद उस परंपरा की वह कड़ी हैं, जिन्होंने आम आदमी को साहित्य का नायक बनाया। उन्होंने खेत में हल चलाते किसान, कर्ज में डूबे परिवार, ईमानदार किंतु परेशान कर्मचारी तथा समाज की उपेक्षा झेलती स्त्री को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ सौ वर्ष पश्चात् भी नई लगती हैं और पाठकों को सोचने पर विवश करती हैं।
आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हम मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए यह संकल्प लेते हैं कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे। उनकी रचनाओं का अध्ययन, उनके विचारों का प्रसार तथा समाज में उनके द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर विमर्श करना ही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
उनकी कलम अमर है, स्मरण शाश्वत है।
विनम्र श्रद्धांजलि।
◆ प्रो. नीलिमा पांडेय
लखनऊ विश्विद्यालय
लखनऊ(उ.प्र.)









