उत्तराखंड के भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसिद्ध मंदिर, बंसी नारायण मंदिर : उत्तराखंड का रहस्यमय एक दिन वाला मंदिर

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उत्तराखंड में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े कई प्रसिद्ध पौराणिक मंदिर और विशेष धार्मिक स्थल स्थित हैं। इनमें सेम मुखेम नागराज मन्दिर, बंसी नारायण मंदिर और मुरली मनोहर मन्दिर विशेष रूप से चर्चित हैं।

टिहरी गढ़वाल का सेम मुखेम मन्दिर उत्तराखंड का ‘पांचवां धाम’ भी कहलाता है। मान्यता है कि यहाँ श्रीकृष्ण ने नाग रूप में वास किया था। दूसरा ख़ास मन्दिर बंसी नारायण है। इसकी विशेषता मन्दिर के कपाट का साल में एक बार खुलना है। मन्दिर आठवीं शताब्दी में बना। इसे चमोली की उर्गम घाटी में आज भी देखा जा सकता है। तीसरा मन्दिर मुरली मनोहर कहलाता है। यह अल्मोड़ा में स्थित है। यहाँ राधा-कृष्ण की सुन्दर प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं।

उत्तराखंड के चमोली जिले की सुरम्य उर्गम घाटी में समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट (3,600 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित बंसी नारायण मंदिर कत्यूरी वास्तुकला और रोचक पौराणिक कथाओं का एक अनूठा संगम है। इस मंदिर को पूरे साल में सिर्फ एक दिन खोलने की परंपरा है। वह ख़ास दिन श्रावण पूर्णिमा अर्थात रक्षा बन्धन का होता है। मंदिर का समय 8वीं शताब्दी ईसवी के आसपास रखा गया है। इसकी ऊंचाई लगभग 10 फुट है।

स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए जा रहे थे, तब उन्होंने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की एक सुंदर चतुर्भुज पाषाण प्रतिमा विराजमान है। अनोखी बात यह है कि इस प्रतिमा में भगवान नारायण के साथ-साथ भगवान शिव के स्वरूप के भी दर्शन होते हैं। मंदिर परिसर में भगवान गणेश और वन देवियों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।

इस मंदिर के साल में सिर्फ एक दिन खुलने और रक्षाबंधन से जुड़े होने के पीछे दो बेहद प्रसिद्ध पौराणिक कथाएं हैं।

राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि का घमंड तोड़ा और उनसे तीन पग भूमि दान में मांग ली तो बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया। राजा बलि की इस दानवीरता और भक्ति से प्रसन्न होकर नारायण ने उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने भगवान से अपने साथ पाताल लोक चलकर वहाँ का द्वारपाल बनने का वरदान मांग लिया और विष्णु जी पाताल चले गए। पति के पाताल लोक जाने से माता लक्ष्मी व्याकुल हो गईं। तब देवर्षि नारद ने उन्हें उपाय बताया कि वे श्रावण पूर्णिमा के दिन पाताल लोक जाकर राजा बलि को रक्षासूत्र (राखी) बांधें और उपहार स्वरूप अपने पति को मांग लें। माता लक्ष्मी ने ऐसा ही किया और राजा बलि ने भगवान विष्णु को मुक्त कर दिया। पाताल लोक के बंधन से मुक्त होने के बाद भगवान विष्णु सबसे पहले इसी स्थान (उर्गम घाटी) पर प्रकट हुए थे, जिसके बाद यहाँ बंसी नारायण रूप में उनकी स्थापना हुई।

दूसरी मान्यता है कि जब माता लक्ष्मी और नारद मुनि भगवान विष्णु को लेने पाताल लोक गए थे, तब उस श्रावण पूर्णिमा के दिन नारद जी बंसी नारायण मन्दिर में भगवान की नित्य पूजा नहीं कर पाए थे। उनकी अनुपस्थिति में उर्गम घाटी के कलगोठ गांव के एक स्थानीय चरवाहे/पुजारी ने भगवान की पूजा-अर्चना की थी।

तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि वर्ष के 364 दिन यहाँ मनुष्यों का आना वर्जित है और अदृश्य रूप से स्वयं देवर्षि नारद यहाँ भगवान की पूजा करते हैं। मनुष्यों को पूजा का अधिकार साल में सिर्फ उसी एक दिन (रक्षाबंधन) मिलता है जिस दिन नारद जी पाताल में थे। आज भी यहाँ के मुख्य पुजारी राजपूत (स्थानीय कलगोठ गांव के निवासी) होते हैं।

परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन के दिन सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही आसपास के गांवों (जैसे कलगोठ, किमाणा, डुमक आदि) की महिलाएँ और युवतियाँ अपने भाइयों को राखी बांधने से पहले भगवान बंसी नारायण को राखी अर्पित करती हैं। स्थानीय ग्रामीण अपने घरों से शुद्ध दूध, घी और ताजा मक्खन लेकर आते हैं जिससे भगवान का अभिषेक कर उन्हें छप्पन भोग लगाया जाता है। सूर्यास्त होते ही मंदिर को फिर से अगले एक वर्ष के लिए बंद कर दिया जाता है।

यह मंदिर उर्गम घाटी के ‘बंसा’ (Bansa) नामक आखिरी गांव से आगे की चढ़ाई पर स्थित है। बंसा क्षेत्र में स्थित नारायण मंदिर होने के कारण भी समय के साथ इसे ‘बंसी नारायण’ कहा जाने लगा।

आप सबको जन्माष्टमी की शुभकामनाएं।

नीलिमा पांडेय, लखनऊ।

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