नंदा देवी राज जात यात्रा : मायके से ससुराल (कैलाश/होमकुंड) विदा करने का प्रतीक

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नंदा देवी राज जात यात्रा (या नंदा राज जात) उत्तराखंड के चमोली जिले (गढ़वाल क्षेत्र) की एक प्राचीन, पवित्र और कठिन तीर्थयात्रा है। इसे अक्सर “हिमालयी महाकुंभ” कहा जाता है। यह लगभग हर 12 वर्षों में आयोजित होती है और नंदा देवी (पार्वती) को उनके मायके से ससुराल (कैलाश/होमकुंड) विदा करने का प्रतीक है। यात्रा करीब 280-290 किलोमीटर लंबी होती है और 19-22 दिनों में पूरी होती है। पूरी यात्रा उच्च हिमालयी क्षेत्रों से गुजरती है।

लोक मान्यताओं के अनुसार नंदा देवी हिमालय (या स्थानीय राजाओं) की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं। एक कथा के अनुसार एक दफ़े वे मायके आईं लेकिन कुछ कारणों से 12 वर्ष तक ससुराल नहीं जा सकीं। बाद में उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया गया, जिससे यह परंपरा शुरू हुई। इस यात्रा में देवी को बेटी मानकर पूरा पहाड़ उन्हें ससुराल भेजता है। इसमें चौसिंग्या खाड़ू (चार सींग वाला मेढ़ा) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह यात्रा का नेतृत्व करता है और अंत में होमकुंड पर देवी के साथ कैलाश की ओर चला जाता है।

इस परंपरा की शुरुआत सातवीं-नौवीं शताब्दी में मानी जाती हैं।
गढ़वाल के राजा शालीपाल (या शालिपाल, चांदपुर गढ़ी) को सातवीं शताब्दी में इस यात्रा को शुरू करने या संगठित करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने बिखरी छोटी-छोटी यात्राओं को एक बड़े रूप में जोड़ने की कोशिश की। आगे चलकर नौवीं शताब्दी में राजा कनकपाल ने इसे भव्य और व्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने नौटी गांव में देवी का ‘श्री यंत्र’ स्थापित किया जो यात्रा का मुख्य आरंभ बिंदु माना जाता है।

नौटी गांव को नन्दा देवी का मायका माना जाता है। नौटियाल ब्राह्मण (नौटी के) गढ़वाल राजाओं के राजगुरु/कुलगुरु रहे हैं और यात्रा के अनुष्ठानों के संरक्षक हैं। कांसुवा (कंसुआ) के कुंवर (राजवंश के वंशज) यात्रा का शाही प्रतिनिधित्व करते हैं। बारह थोकदार परिवार और अन्य स्थानीय समुदाय (रावत, नेगी आदि) भी इसमें शामिल होते हैं। इस यात्रा का “राज जात” नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह राजकीय संरक्षण में होती थी, जबकि वार्षिक छोटी यात्राओं को ‘लोक जात’ कहा जाता है।

कुमाऊं क्षेत्र में नंदा देवी की पूजा चंद राजवंश काल में और विकसित हुई। शुरू में सिर्फ़ एक देवी पूज्य थी, बाद में नंदा-सुनंदा की जुड़ी पूजा शुरू हुई। प्रारंभ में गढ़वाल और कुमाऊं की परंपराएं अलग-अलग थीं, लेकिन उत्तराखंड राज्य गठन के बाद सन 2000 की यात्रा में लगभग 90 वर्ष के अंतराल पर अल्मोड़ा की नंदा भी शामिल हुई। इस तरह नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड की साझा सांस्कृतिक प्रतीक बनी।

♦️ दस्तावेजी इतिहास और आयोजन

लिखित रिकॉर्ड्स के अनुसार मुख्य राज जातें इन वर्षों में हुईं: 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951 (मौसम के कारण अधूरी), 1968, 1987, 2000 और 2014 (2013 की केदारनाथ आपदा के कारण स्थगित)। 12 वर्ष का चक्र हमेशा सटीक नहीं रहा—मौसम, आपदाएं, राजपरिवार की घटनाएं या अन्य कारणों से अंतराल कभी 13, 14 या अधिक वर्षों का हो गया।

यात्रा आमतौर पर नौटी (या कुछ परंपराओं में कुरुड़ सिद्धपीठ) से शुरू होकर वाण, बेदनी बुग्याल, रूपकुंड आदि से होते हुए होमकुंड (त्रिशूली शिखर के पास) पहुंचती है। हजारों श्रद्धालु नंगे पांव शामिल होते हैं। इसमें डोलियां, छतरियां, जागर, भजन और विभिन्न गांवों के देवी-देवता जुड़ते हैं।

यह सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि गढ़वाल-कुमाऊं की सांस्कृतिक एकता, लोक परंपराओं और हिमालयी आस्था का जीवंत प्रमाण है। यह परंपरा राजवंशों, पुजारियों और स्थानीय समुदायों द्वारा सदियों से संरक्षित रही है। हाल के वर्षों में कुरुड़ से बड़ी लोक जात और नौटी से राज जात को लेकर कुछ आंतरिक वैमनस्य देखने को मिला, मुद्दे पर तमाम चर्चाएं भी हुई हैं। लेकिन दोनों यात्राओं की मूल भावना एक ही है।

नन्दा राजजात यात्रा का इतिहास मुख्यतः लोक कथाओं, राजवंश परंपराओं और 19वीं शताब्दी से उपलब्ध रिकॉर्ड्स पर आधारित है। इससे संबंधित पूर्ण पुरातात्विक या लिखित साक्ष्य सीमित हैं, लेकिन यात्रा की प्राचीनता और सांस्कृतिक महत्व निर्विवाद है।
नीलिमा पांडेय, लखनऊ।

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