
राजी जनजाति जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘बनरावत’ या ‘बनराउत’ भी कहा जाता है, उत्तराखंड की अनूठी, रहस्यमयी और सबसे छोटी आदिम जनजाति है। मुख्य रूप से पिथौरागढ़ जिले की धारचूला, कनालीछीना और डीडीहाट तहसीलों के कुछ चुनिंदा गांवों जैसे किमखोला, गनगांव, कुटा चौरानी और चंपावत जिले में निवास करने वाला यह समुदाय आज भी अपनी प्राचीन किरातकालीन विरासत को समेटे हुए है। नृवैज्ञानिकों के अनुसार, राजी लोग सीधे तौर पर प्राचीन किरात वंश के सबसे निकटतम आधुनिक वंशज माने जाते हैं जिन्होंने सदियों तक खुद को बाहरी दुनिया की चकाचौंध से दूर घने जंगलों के बीच सुरक्षित रखा।

इस अनूठी जनजाति के इतिहास की सबसे विस्मयकारी परंपरा ‘मूक विनिमय’ (Silent Barter) या अदृश्य व्यापार रही है।प्राचीन काल में ये लोग अत्यधिक संकोची स्वभाव के होने के कारण बाहरी लोगों के सामने आने से डरते थे। इसलिए रात के अंधेरे में वे अपने द्वारा बनाए गए लकड़ी के बर्तन जैसे ठेकी और नाली स्थानीय ग्रामीणों के घरों के बाहर या खेतों में रख आते थे और उनके बगल में अपनी जरूरत की वस्तु जैसे अनाज या कपड़ा का एक प्रतीक छोड़ देते थे। अगली रात ग्रामीण उन बर्तनों के बदले वहां अनाज या जरूरत का सामान रख देते थे, जिसे राजी लोग चुपचाप उठा ले जाते थे। बिना एक-दूसरे को देखे या बात किए होने वाला यह व्यापार इतिहास में विश्वास और ईमानदारी का एक अनूठा उदाहरण है, हालांकि आधुनिक काल में अब यह प्रथा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।

इस समुदाय की आजीविका मुख्य रूप से काष्ठ कला पर आधारित रही है। राजी लोग जंगलों में पाई जाने वाली विशेष लकड़ियों से घरेलू उपयोग के अत्यंत सुंदर और मजबूत बर्तन बनाने में माहिर माने जाते हैं। पारंपरिक रूप से इनका जीवन पूरी तरह वनों पर आश्रित था जहाँ ये शिकार, कंदमूल एकत्रीकरण और लकड़ी के बर्तन बनाकर जीवन यापन करते थे, लेकिन वर्तमान समय में वनों से जुड़े कड़े कानूनों के कारण इनकी आजीविका में बदलाव आया है। अब ये लोग खेती-बाड़ी, मजदूरी और जड़ी-बूटी संग्रहण की ओर रुख कर रहे हैं।
भाषाई दृष्टि से राजी समुदाय की अपनी एक विशिष्ट मातृभाषा है जिसे ‘राजी’ या ‘पुग्या’ कहा जाता है। भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह भाषा मुख्य रूप से तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार और प्राचीन ‘मुंडा’ या ‘कोल’ भाषाई लक्षणों का एक अत्यंत दुर्लभ मिश्रण है। बाहरी दुनिया से संपर्क के कारण अब इस समुदाय के लोग स्थानीय कुमाऊँनी और हिंदी भाषा को भी अच्छी तरह समझने और बोलने लगे हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण से राजी लोग मूल रूप से प्रकृति-पूजक हैं जो देवी-देवताओं के लिए किसी भव्य मंदिर या मूर्तियों का निर्माण नहीं करते, बल्कि जंगलों में ही किसी ऊंचे पेड़, चट्टान या नदी के किनारे खुले आसमान के नीचे अपने देवताओं की पूजा करते हैं, जिसे स्थानीय रूप से ‘साँक’ कहा जाता है। इनके मुख्य देवताओं में सैम, मल्लिकार्जुन, छुरमल और बागनाथ शामिल हैं, जो प्रकृति और जंगलों की रक्षा से जुड़े माने जाते हैं।
इनकी वैवाहिक और सामाजिक व्यवस्था भी काफी अनोखी है। राजी समाज पितृसत्तात्मक होता है। इनके समाज में विवाह को लेकर कुछ अनूठे नियम रहे हैं, जैसे शादी तय होने पर वर पक्ष द्वारा वधु पक्ष को एक निश्चित धनराशि या उपहार देने की प्रथा होती है जिसे ‘दाम टका’ कहा जाता है। पहले इनके समाज में लड़की को भगाकर शादी करने वाले ‘पलायन विवाह’ का भी चलन था, जिसे बाद में सामाजिक पंचायत द्वारा मान्यता दे दी जाती थी।
◆ नीलिमा पाण्डेय, लखनऊ











