
यह किताब मलिका अमर शेख की आत्मकथा है। मूल मराठी में 1984 में छपी थी। अब हिंदी में राधाकृष्ण पब्लिकेशन से आई है। अनुवाद सुनीता डागा ने किया है। मलिका जब सिर्फ 19 साल की थीं, तब उनका विवाह मशहूर दलित कवि नामदेव ढसाल से हुआ। किताब उसी शादी की पूरी कहानी है, प्रेम, झगड़े, हिंसा और टूटन की।किताब का सबसे बड़ा और कठिन हिस्सा नामदेव ढसाल के साथ का संघर्ष है। मलिका ने खुलकर लिखा है कि नामदेव बाहर क्रांति की बात करते थे, लेकिन घर में पति के रूप में बहुत हिंसक और नियंत्रण करने वाले थे। शारीरिक और मानसिक हिंसा के बावजूद मलिका उनसे प्यार भी करती थीं, लेकिन धीरे धीरे ये प्यार घृणा और गुस्से में बदल गया।
वे आंदोलन में सक्रिय थीं, लेकिन घरेलू जिंदगी में खुद को बर्बाद होते महसूस कर रही थीं।
यह किताब दिखाती है कि कितना भी बड़ा क्रांतिकारी पति हो, अगर घर में स्त्री की इज्जत और आजादी नहीं है, तो सब कुछ खोखला हो जाता है। मलिका ने बिना कुछ छुपाए अपना दर्द, गुस्सा और द्वंद्व को लिखा है। यही इस किताब को बहुत सच्चा और ताकतवर बनाता है। किताब की खूबियां सच्चाई से भरी हुई है। यौनिकता और घरेलू हिंसा को बिना शर्म के बताया गया है।
किताब सिर्फ पुरुष स्त्री की लड़ाई नहीं दिखाती, बल्कि वामपंथ, दलित आंदोलन और व्यक्तिगत जिंदगी के बीच की टकराहट भी दिखाती है। स्त्रियों को यह संदेश देती है कि आर्थिक रूप से मजबूत बनो। अपनी छत खुद कमाओ, ताकि किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
यह किताब उन सभी स्त्रियों की आवाज है जो क्रांतिकारी घरों में भी दूसरी जगह पर रहती हैं। मलिका की कहानी सिखाती है कि नारों से आगे जाकर आर्थिक आजादी, भावनात्मक मजबूती और घरेलू सुरक्षा जरूरी है। यह किताब पढ़ने लायक है।









