भारत का रॉबिनहुड : भांतू समुदाय से निकला वह सुल्ताना डाकू जिसने ब्रिटिश राज को हिला दिया

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सुल्ताना डाकू ब्रिटिश भारत के 1920 के दशक का एक प्रसिद्ध डाकू था जिसे अक्सर भारत का रॉबिनहुड कहा जाता है। उसका असली नाम सुल्तान सिंह था और वह भांतू समुदाय से था जिसे अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति घोषित कर रखा था। उसका जन्म लगभग 1901 में मुरादाबाद जिले के हरथला गांव में हुआ था हालांकि कुछ लोग बिजनौर का भी बताते हैं। भांतू लोग खुद को महाराणा प्रताप का वंशज मानते थे इसलिए सुल्ताना ने भी अपने घोड़े का नाम चेतक रखा था और कुत्ते का नाम राय बहादुर। आज से हम सन्डे स्पेशल में सुल्ताना डाकू पर एक सीरीज़ शुरू कर रहे हैं। प्रस्तुत है पहली कड़ी

एक ऐसे देश में जहां भुखमरी-गरीबी आम रहे हों वहाँ जिंदगी बिताने के लिए लोगों का ब-राह गुनाह के साथ हो लेना कोई अनसुलझी गुत्थी नहीं है।

औपनिवेशिक दस्तावेज से जानकारी मिलती है कि अपने यहां तो चिन्हित रूप से कुछ जातियों को अपराधी-श्रेणी में रखा जाता था। इन्हें जरायम-पेशा कहा गया है।

इन जातियों पर पुलिसिया चौकसी रहती और तमाम सरकारी योजनाओं के तहत रोजगार मुहैया कराने की कोशिश होती थी। उद्देश्य ये था कि ये लोग अपराध का दामन छोड़ दें। लेकिन तमाम कवायद के बाद भी लोहे की जंग की तरह अपराध का न तो दामन छूटता और न ही उनकी मुश्किलात कम होती थी।

ऐसी ही एक जरायमपेशा जाति डकैतों की थी जो आंतरिक रूप से अलग-अलग समुदायों में बंटे हुए थे। इस जाति के बड़े-बुजुर्ग डकैती की बारीकियां अपने नौजवानों को सिखाते थे। इसके दो फायदे थे, एक तो उनका हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता दूसरे बुढ़ापे में उनकी रोजी-रोटी का बंदोबस्त हो जाता। उनके चेले अपने गुरु को लूट के माल में हिस्सेदार बनाते। इस वजह से पुलिस की उन पर तगड़ी निगरानी रहती और कहीं आने जाने से पहले उन्हें पुलिस से इजाजत लेनी पड़ती थी। लूटपाट के तीन गुरु मंत्र थे पहला मोर्चा अकेले संभालना है, कोई संगी-साथी नहीं होना चाहिए; दूसरा वारदात रिहायशी बस्ती से ठीक-ठाक दूरी पर अंजाम दी जाए और तीसरे मारपीट खून-खराबा किसी भी हालत में ना किया जाए।

शर्तों को पूरा करने के लिए बेहतर था कि लूटपाट को अंजाम किसी दूसरे बड़े शहर में जाकर दिया जाए। इसलिए इस डकैत समुदाय के नौजवान कोलकाता, मुंबई जैसे शहरों में घरेलू सहायक की नौकरी कर लेते थे और मौका मिलते ही हाथ साफ कर नौ दो ग्यारह। ‘वजन कम कीमत अधिक’ चोरी के माल को लेकर उनका उसूल था। इसलिए अमूमन वे मोटा माल पार करते थे। सोना-चांदी, हीरे- जावारात उनकी पहली पसंद थे।

डकैतों की इस बिरादरी के कुछ लोग आसान रास्ता अपनाते और पुलिस की नज़र में कम आते थे। ये लोग चौकीदारी का पेशा अपनाते। चोर-चकार के रूप में ख्यातिप्राप्त जाति को कोई क्यों चौकीदार रखेगा भला? पहला सवाल तो जेहन में यही आता है।

दरअसल चौकीदार की नौकरी उन्हें एक ‘कुटिल अनुबंध’ के तहत मिलती थी। अनुबंध यह कि उन्हें चौकीदार रखना माने अपने घर को चोरी- डकैती से कर महफूज कर लेना। इसके लिए एक हथकंडा अपनाया जाता था। चोरी की रात चौकीदार अपने जूते उस घर के बाहर छोड़ देता था जहां उसकी ड्यूटी होती। जूते का जोड़ा चोरी के खिलाफ चौकीदार की गारंटी थी। हालांकि इस काम के लिए उन्हें कोई खास तनख्वाह नहीं मिलती थी। उस समय (औपनिवेशिक काल में) 3/- से 5/- रुपए दिए जाते थे। लेकिन काम भी क्या था? रात में रात में जूते घर के सामने रखने होते और सुबह उन्हें वापस उठा लेना था।

बहरहाल सारी जरायम पेशा जातियां खून-खच्चर से परहेज नहीं बरतती थीं। भांतू समुदाय के लोग इनमें से एक थे। डाकू सुल्ताना भी भांतू बिरादरी से था। वह अपनी पत्नी, छोटे बच्चे और दूसरे तमाम लोगों के साथ नजीबाबाद के किले में नज़र बन्द था। ये जरायम पेशा लोगों के लिए की गई सरकारी व्यवस्था थी। किले की जिम्मेदारी साल्वेशन आर्मी के पास थी।

कोई भी युवा व्यक्ति अपना जीवन नज़रबंदी में नहीं गुजारना चाहेगा। लिहाजा एक दिन सुल्ताना किले की कैद से छूट भागा। इसी के साथ उसके जंगलों की ख़ाक छानने और आतंक का पर्याय बन जाने का किस्सा शुरू होता है।

किले से फरार होने के बरस भीतर सुल्ताना ने हथियार बन्द सौ लोगों का गिरोह बना लिया था। इस भारी-भरकम गिरोह ने पूरब में गोंडा से लेकर पश्चिम में सहारनपुर तक का इलाका अपनी कारगुजारियों से हलकान कर रखा था।

कभी-कभी यह गिरोह पंजाब जाकर भी लूट-पाट कर आता था। आमतौर पर ये लोग तराई और भाबर के जंगलों में छिपे रहते थे और लगभग रोज ही अपना ठिकाना बदलत देते।

सुल्ताना और उसके गिरोह की हरकतें जैसे-जैसे परवान चढ़ीं सरकारी दफ्तरों में उनके कारनामों को दर्ज़ करती फाइलों की मोटाई बढ़ती गयी।

तराई और भाबर के जिस इलाके में सुल्ताना ने अपनी डकैती की सल्तनत कायम कर ली थी, वह कुमाऊँ के कमिश्नर होने के नाते पर्सी विंडहैम के जिम्मे था। इस इलाके को सुल्ताना की दहशत से छुटकारा दिलाने के लिए विंडहैम ने फ्रेडी यंग नाम के पुलिस अफसर की माँग सरकार से की थी।

फ्रेडी यंग की गिनती अपने वक्त के बेहतरीन पुलिस अफसरों में होती थी और उसे कुछ बरस संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में नौकरी करने का तजुर्बा था। सरकार ने विंडहैम की माँग मानते हुए स्पेशल डकैती पुलिस फोर्स कायम करने की मंजूरी दे दी। फ्रेडी को इस पुलिस फोर्स का सुप्रीम कमांडर बना दिया गया।

सुल्ताना के गिरोह से विंडहैम इतने त्रस्त थे कि उन्होंने
फ्रेडी को अपनी पसंद के जवान भर्ती करने की खुली छूट फे दी थी। फ्रेडी ने आसपास के जिलों की पुलिस फोर्स से बेहतरीन लोगों की टीम अपने लिए चुन ली।

इस मामले में फ्रेडी को दूसरे पुलिस अफसरों की नाराजगी भी मोल लेनी पड़ी। सुल्ताना के सिर पर हजारों रुपये का इनाम था जिसे हासिल करने का सपना हर पुलिस अफसर देखता था। लेकिन उनके बेहतरीन जवान फ्रेडी की स्पेशल फोर्स में चले जाने की वजह से अब इनाम हासिल करने की उम्मीद पर पानी फिरता नज़र आ रहा था।

दरअसल फ्रेडी की नई फोर्स में आए लोग अपने जिलों के पुलिस कप्तानों को इनाम दिलाने में मददगार साबित हो सकते थे।
(क्रमशः)
◆ नीलिमा पांडेय, लखनऊ

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