
रामनगर। उत्तराखंड के जंगलों में गजराजों की जिंदगी पर संकट गहराता जा रहा है। कभी रेलवे ट्रैक पर तेज रफ्तार ट्रेन हाथियों की जान ले रही है तो कभी जंगल के भीतर आपसी संघर्ष उनकी मौत का कारण बन रहा है। हाल ही में टांडा रेंज में ट्रेन की चपेट में आकर हाथी की मौत की घटना के बाद अब रामनगर वन प्रभाग की कोटा रेंज में करीब 50 वर्षीय नर टस्कर का शव मिलने से वन्यजीव प्रेमियों की चिंता बढ़ गई है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं एक बड़ा सवाल छोड़ रही हैं कि आखिर जंगल के इन विशालकाय जीवों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है?
शुक्रवार सुबह कोटा रेंज के दक्षिणी पाटकोट बीट में सफारी रोड पर एक विशालकाय नर टस्कर का शव मिलने से वन विभाग में हड़कंप मच गया। शुरुआती जांच में हाथी की मौत दो गजराजों के बीच हुए आपसी संघर्ष में होने की आशंका जताई गई है। घटनास्थल पर जगह-जगह मिले खून के निशान इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि हाथियों के बीच संघर्ष किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि काफी दूरी तक चला।
वनकर्मियों ने गश्त के दौरान सफारी रोड पर खून के निशान देखे। जब आसपास तलाश की गई तो कुछ दूरी पर टस्कर का शव बरामद हुआ। करीब 50 वर्ष उम्र के इस हाथी के दांतों की लंबाई लगभग 1.34 मीटर बताई गई है। उसके शरीर पर भी संघर्ष के निशान मिले हैं। एक उम्रदराज टस्कर का इस तरह जंगल में दम तोड़ देना वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से गंभीर घटना है।
सूचना पर रामनगर वन प्रभाग के एसडीओ अंकित बडोला और कोटा रेंज के रेंजर संजय कुमार वनकर्मियों के साथ मौके पर पहुंचे। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के वरिष्ठ वन्यजीव पशु चिकित्साधिकारी डॉ. दुष्यंत शर्मा तथा नैनीताल जू के पशु चिकित्सक डॉ. हिमांशु पांगती की देखरेख में हाथी का पोस्टमार्टम कराया गया। वन विभाग का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि हो सकेगी।
सवालों के घेरे में गजराजों की सुरक्षा
टांडा रेंज में ट्रेन की चपेट में हाथी की मौत और अब कोटा रेंज में आपसी संघर्ष में टस्कर की जान जाने की घटनाएं भले ही अलग-अलग परिस्थितियों में हुई हों, लेकिन दोनों ने हाथियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
रेलवे ट्रैक पर हाथियों की आवाजाही के दौरान उनकी जान पर खतरा बना रहता है। वहीं जंगल के भीतर होने वाले संघर्ष भी कई बार जानलेवा साबित होते हैं। ऐसे में हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों, उनके विचरण क्षेत्रों और सुरक्षित प्राकृतिक आवासों की निगरानी का सवाल अहम हो जाता है।
हाथी केवल जंगल की शोभा नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके सुरक्षित आवागमन और प्राकृतिक आवासों का संरक्षण वन्यजीव संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।
मौत के बाद जांच, लेकिन पहले से सुरक्षा का क्या?
हर ऐसी घटना के बाद वन विभाग जांच और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी करता है, लेकिन असली चुनौती यह है कि क्या हाथियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण बनाए रखने को लेकर पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं? रेलवे ट्रैक के संवेदनशील हिस्सों पर निगरानी, हाथियों के पुराने गलियारों का संरक्षण और जंगलों में उनकी गतिविधियों पर प्रभावी नजर रखना समय की जरूरत है।
कोटा रेंज में मिले मृत टस्कर की मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट होगा। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि जंगल के राजा कहे जाने वाले गजराज भी हर वक्त सुरक्षित नहीं हैं।











