तीजनबाई और पंडवानी : छत्तीसगढ़ की लोक कला की अमर आवाज

खबर शेयर करें -

देहरादून। भारतीय लोक संस्कृति की धरोहरों में पंडवानी एक अनुपम कला है। यह महाभारत की कथाओं को संगीत, गायन और नाटकीय अभिनय के माध्यम से जीवंत करने वाली छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला है। इस कला को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली महान कलाकार डॉ. तीजनबाई (8 अगस्त 1956 से 5 जुलाई 2026) का नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। तीजनबाई न केवल पंडवानी को पुरुष-प्रधान क्षेत्र से निकालकर महिलाओं की पहुंच में लाईं, बल्कि इसे गांव की चौपाल से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। पद्म विभूषण प्राप्त उनकी यह यात्रा संघर्ष, समर्पण और सांस्कृतिक संरक्षण की मिसाल है।

पंडवानी कला

पंडवानी शब्द “पांडव + वाणी” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है पांडवों की कहानी। यह छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों (मध्य प्रदेश, ओडिशा आदि) में प्रचलित लोक कथा गायन की एक विशिष्ट शैली है। इसमें महाभारत के प्रसंगों को मुख्य रूप से भीम को केंद्र में रखकर गाया और अभिनीत किया जाता है।

मुख्य विशेषताएं

एकल प्रस्तुति: मुख्य कलाकार अकेले ही गाता, बोलता और कई पात्रों का अभिनय करता है।
वाद्य यंत्र: तंबूरा (एकतारा) मुख्य वाद्य है।
तम्बूरा प्रॉप के रूप में भीम की गदा, अर्जुन का धनुष, द्रौपदी के बाल आदि की भूमिका निभाता है।
पंडवानी की दो शैलियां प्रचलित हैं। पहली कापालिक शैली जिसमें खड़े होकर, जोरदार आवाज, नाटकीयता के साथ प्रस्तुति दी जाती है। यह स्मृति पर आधारित है। इसमें इम्प्रोवाइजेशन मिलता है। दूसरी शैली वेदमती कहलाती है। इसमें बैठकर, शांत और ग्रंथ आधारित प्रस्तुति दी जाती है।
भाषा और रस: पंडवानी की प्रस्तुति छत्तीसगढ़ी भाषा में वीर रस प्रधान होती। प्रस्तुति में करुण, रौद्र और भक्ति का रस का भी मिश्रण मिलता है।

संगीत : रागी (सहायक गायक) टेक दोहराते हैं। ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा आदि सहायक वाद्य के रूप में इस्तेमाल होते हैं।

पंडवानी की जड़ें परधान और देवार समुदायों की मौखिक परंपरा में हैं। पहले पूरे महाभारत को कई शामों में गाया जाता था, लेकिन आधुनिक समय में छोटी और कम समय लेने वाली प्रस्तुतियां लोकप्रिय हुईं। यह कला मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शिक्षा, नैतिक मूल्यों और वीरता का माध्यम है जिसे इस मकाम तक पहुंचाने में तीजनबाई बाई ने अपना जीवन लगा दिया।

तीजनबाई संघर्ष से शिखर तक

तीजनबाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के भिलाई के निकट गनियारी गांव में हुआ। पिता हुनुक लाल पारधी और माता सुखवती थीं। तीज पर्व के दिन जन्म होने के कारण वह तीजन कहलायीं।

बचपन में वह अपने नाना ब्रजलाल पारधी को महाभारत की कहानियां गाते सुनतीं। इन कहानियों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि धीरे-धीरे वे उन्हें कंठस्थ करती गईं। मात्र 12 वर्ष की आयु में तीजन बाई का विवाह हो गया। 13 वर्ष की उम्र से वह पंडवानी गायिकी से जुड़ गयीं। आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक विरोध के बावजूद उनकी लगन अटूट रही।

चंद्रखुरी गांव में उन्होंने पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया और मात्र 10 रुपये प्राप्त किए। उस समय महिलाएं केवल वेदमती शैली में बैठकर गा सकती थीं। तीजनबाई ने कापालिक शैली अपनाकर इतिहास रच दिया। वे खड़े होकर, गरजती हुई आवाज में अभिनय करती हुईं पंडवानी प्रस्तुति देतीं।

प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा देखी और उन्हें आगे बढ़ाया। तीजनबाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रदर्शन का मौका मिला, जिसने उनके करियर को नई ऊंचाई दी।

तीजनबाई का योगदान

कला में क्रांति : तीजनबाई पंडवानी की पहली प्रमुख महिला कलाकार बनीं जिन्होंने पुरुष-प्रधान कापालिक शैली को अपनाया। उनकी दमदार आवाज, तंबूरे का सृजनात्मक उपयोग और पात्रों का जीवंत अभिनय (द्रौपदी चीरहरण, दुषासन वध, भीम-अर्जुन आदि) दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।

वैश्विक प्रसार उन्होंने भारत के कोने-कोने और विदेशों (फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, जापान आदि) में पंडवानी पहुंचाई।
श्याम बेनेगल के भारत एक खोज में उनकी प्रस्तुतियां लाखों घरों तक पहुंचीं। उन्होंने पंडवानी को लोक कला से उठाकर सांस्कृतिक राजदूत का दर्जा दिलाया।

सशक्त स्त्री की मिसाल गरीबी, बाल विवाह, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक दबाव के बावजूद तीजनबाई ने कला को नहीं छोड़ा। उनकी सफलता तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी। वे साबित करती हैं कि प्रतिभा और समर्पण किसी भी बाधा को पार कर सकता है।

सांस्कृतिक संरक्षण : उन्होंने महाभारत की लोक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया। बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. से सम्मानित किया।

प्रमुख सम्मान और उपलब्धियां

पद्म श्री (1988)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
पद्म भूषण (2003)
पद्म विभूषण (2019) छत्तीसगढ़ की पहली महिला को यह सम्मान
नृत्य शिरोमणि और अन्य कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार
वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजदूत बनीं।

प्रदर्शन शैली

मंच पर तीजनबाई जब तंबूरा लेकर खड़ी होतीं, तो पूरा वातावरण बदल जाता। उनकी गरजती आवाज कुरुक्षेत्र का युद्ध याद दिलाती। द्रौपदी की करुणा, भीम का क्रोध, अर्जुन की बेचैनी सब उनके स्वर और अभिनय में जीवंत हो उठते। तंबूरा कभी गदा बनता, कभी धनुष। दर्शक मात्र श्रोता नहीं, कथा के साक्षी बन जाते। उनकी प्रस्तुतियां छोटे गांवों से लेकर बड़े शहरों और विदेशी थिएटरों तक पहुंचीं। हर प्रदर्शन में वे छत्तीसगढ़ की मिट्टी, लोक संस्कृति और महाभारत की सार्वभौमिकता को जोड़तीं।

चुनौतियां और व्यक्तिगत जीवन

तीजनबाई का जीवन आसान नहीं था। बाल विवाह, पंडवानी गाने के कारण सामाजिक विरोध, आर्थिक तंगी , उन्होंने सब झेला। लेकिन पति टुक्का राम का साथ और अपनी अटूट इच्छाशक्ति ने उन्हें आगे बढ़ाया। वे कहतीं थीं कि पंडवानी उनकी सांस है। संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया और उनकी कला को गहराई दी।

विरासत और प्रभाव

5 जुलाई 2026 को रायपुर के AIIMS में 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। पूरे देश में शोक की लहर दौड़ी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं ने श्रद्धांजलि दी। उनका अंतिम संस्कार गनियारी गांव में राजकीय सम्मान के साथ हुआ।

तीजनबाई की विरासत निरन्तरता में आज भी जीवित है। नई पीढ़ी के कलाकार उन्हें आदर्श मानते हैं। पंडवानी अब छत्तीसगढ़ की पहचान है। वहाँ सांस्कृतिक उत्सवों में पंडवानी अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। महिला कलाकारों उषा बाई, शांतिबाई आदि को तीजनबाई के व्यक्तित्व से निश्चित ही प्रेरणा मिलती हैं। ये पण्डवानी कलाकार तीजनबाई की विरासत को संरक्षित रखने का कार्य बखूबी कर रहे हैं।

तीजनबाई एक सांस्कृतिक योद्धा थीं। उन्होंने साबित कर दिखाया कि लोक कला कितनी शक्तिशाली हो सकती है। एक गरीब आदिवासी लड़की से पद्म विभूषण प्राप्त महान कलाकार तक की उनकी यात्रा प्रत्येक कलाकार के लिए प्रेरणा का स्रोत है। जब भी हम पंडवानी की चर्चा करते हैं, तो तीजनबाई की गरजती आवाज कानों में बरबस गूंज जाती है। वस्तुतः उनकी कला छत्तीसगढ़ की मिट्टी से उठकर पूरे भारत और विश्व की साझा धरोहर बन गई।

अगर हम कहें की अपने प्रयास से तीजनबाई पंडवानी को महाकाव्य महाभारत की तरह अमर कर गयी हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जो रिश्ता महाभारत के साथ महर्षि व्यास का है वही पण्डवानी के साथ तीजनबाई का है।

तीजनबाई की स्मृति को श्रद्धांजलि।

◆ लेखक :
प्रोफेसर नीलिमा पाण्डेय,
लखनऊ विश्वविद्यालय।

सम्बंधित खबरें