सन्डे स्पेशल: भोटिया-तिब्बत व्यापार: विश्वास, कुंडाखार और गमग्या की अनोखी परंपरा

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उत्तराखंड/ लखनऊ। भोटिया-तिब्बत व्यापार इतिहास में आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ विश्वास, दोस्ती और जुबान की कीमत पर चलने वाला एक अद्भुत व्यापारिक तंत्र था। उत्तराखंड की भोटिया जनजाति शौका, रंग, मार्छा और तोलछा के लोग तिब्बत के निवासियों को ‘हुणिया’ और उनके देश को ‘हुण देश’ कहते थे। दोनों देशों के व्यापारियों के बीच कोई आधुनिक लिखित कानून या पुलिसिया व्यवस्था नहीं थी। इसलिए कठिन हिमालयी परिस्थितियों में व्यापार को सुरक्षित बनाए रखने के लिए उन्होंने ‘कुंडाखार’ और ‘गमग्या’ जैसी अनोखी अनुबंधित प्रथाएँ विकसित की थीं।

इस व्यापारिक समझौते की शुरुआत ‘मित्र’ या ‘आढ़ती’ बनाने की परंपरा यानी ‘सरसू मुल छू’ से होती थी। इसके तहत प्रत्येक भोटिया व्यापारी का तिब्बत में एक विशिष्ट हुणिया व्यापारी साझेदार होता था, जिसे वे ‘मित्र’ कहते थे। यह व्यापारिक रिश्ता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था और एक भोटिया व्यापारी केवल अपने तयशुदा तिब्बती मित्र के साथ ही लेन-देन कर सकता था। इस दोस्ती और विश्वास के बंधन को मजबूत करने के लिए जब दो व्यापारी पहली बार व्यापारिक संबंध स्थापित करते थे तब कुंडाखार प्रथा का पालन किया जाता था।

इस रस्म के तहत दोनों व्यापारी अपने-अपने आराध्य देवता की मूर्ति या किसी पवित्र धार्मिक ग्रंथ को अपने सिर पर रखते थे और स्थानीय रूप से बनी पारंपरिक शराब (जिसे ‘जाड़’ कहा जाता था) को सोने और चांदी के बर्तनों या आभूषणों से छुआकर दोनों साथ में पीते थे। इस दौरान वे कसम खाते थे कि वे एक-दूसरे को कभी धोखा नहीं देंगे, सुख-दुख में साथ निभाएँगे और संकट के समय एक-दूसरे के माल व जान की रक्षा करेंगे। एक बार कुंडाखार हो जाने के बाद इसे तोड़ना सबसे बड़ा पाप माना जाता था।

व्यापारिक शर्तों को आधिकारिक रूप देने के लिए एक लिखित विलेख तैयार किया जाता था, जिसे ‘गमग्या’ या ‘गमजा’ कहा जाता था। इस प्रतिज्ञा-पत्र पर दोनों पक्षों के लेन-देन, सामान की मात्रा और दरों का पूरा लेखा-जोखा होता था। इस पत्र को प्रमाणित करने के लिए एक विशेष लकड़ी, रबर या धातु की मुहर लगाई जाती थी, जिसे ‘थचिया’ या ‘थच’ कहते थे। मुहर पर व्यापारी का विशिष्ट चिन्ह या हस्ताक्षर खुदा होता था और भोटिया समुदाय में इस मुहर को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था।

यह व्यापार पूरी तरह से वस्तु-विनिमय (बार्टर सिस्टम) पर आधारित था। भोटिया व्यापारी अपनी भेड़ों, बकरियों और झब्बुओं (याक और गाय की संकर प्रजाति) पर लादकर भारत से अनाज, गुड़, तंबाकू, फाँफर, कपड़े और कांसे के बर्तन तिब्बत ले जाते थे। बदले में वे तिब्बत से उच्च गुणवत्ता वाली पशमीना व तिब्बती ऊन, सुहागा (बोरेक्स), नमक, स्वर्ण चूर्ण, कस्तूरी और याक की पूँछ (चंवर) लेकर भारत लौटते थे। यह सदियों पुरानी समृद्ध परंपरा 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद पूरी तरह बंद हो गई, क्योंकि चीन ने तिब्बत की सीमाओं को सील कर दिया था। इसके बाद भोटिया जनजाति का पारंपरिक जीवन पूरी तरह बदल गया। हालांकि हाल के वर्षों में भारत और चीन के बीच समझौतों के तहत लिपुलेख दर्रे (पिथौरागढ़) के जरिए इस पारंपरिक सीमा व्यापार को सीमित स्तर पर फिर से बहाल करने के प्रयास शुरू किए गए हैं।

शौका (भोटिया) जनजाति का ऐतिहासिक ‘हूण’ (Huns) जाति से कोई सीधा जातीय या जेनेटिक संबंध नहीं है, हालांकि दोनों के बीच एक गहरा ऐतिहासिक और भाषाई संदर्भ अवश्य मिलता है, जिसके कारण अक्सर लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। उत्तराखंड की शौका जनजाति का इतिहास तिब्बत के साथ सदियों पुराने व्यापार से जुड़ा है। प्राचीन काल में जब मध्य एशियाई हूण आक्रांताओं ने भारत और तिब्बत के कुछ हिस्सों पर आक्रमण किया था, तब से हिमालयी क्षेत्रों में ‘उत्तर दिशा से आने वाले अजनबियों या विदेशियों’ के लिए ‘हूण’ या ‘हुणिया’ शब्द का प्रयोग होने लगा था। चूंकि शौका व्यापारी तिब्बतियों के साथ व्यापार करते थे, इसलिए उनके इस संदर्भ को ‘हूणों’ के साथ जोड़ दिया जाता है, जबकि यह केवल एक भौगोलिक और भाषाई संबोधन था।

जातीय और मूल भिन्नता के दृष्टिकोण से हूण मूल रूप से मध्य एशिया की एक बर्बर, खानाबदोश और अत्यधिक लड़ाकू योद्धा जाति थी, जिसने गुप्त साम्राज्य के समय भारत पर भीषण आक्रमण किए थे। भारत में विलीन हुए हूणों के वंशज मुख्यतः मैदानी इलाकों के कुछ समुदायों, जैसे कुछ राजपूत शाखाओं और गुर्जरों में समाहित हो गए। इसके विपरीत शौका लोग मूल रूप से मंगोलायड (किरात-भील वंशीय) और तिब्बती-बर्मी भाषाई परिवार से संबंध रखते हैं। कुछ इतिहासकार और ब्रिटिश नृवंशविज्ञानी शौका समुदाय के मूल को ऐतिहासिक शकों (Scythians) से जोड़कर देखते हैं, लेकिन हूणों से इनका कोई जेनेटिक प्रमाण नहीं मिलता। इतिहासकार गिरधर सिंह नेगी जैसे विद्वानों के शोध के अनुसार शौका समुदाय का इतिहास रामायण और महाभारत काल जितना प्राचीन है और वे हिमालय की घाटियों के मूल निवासी हैं, जिन्होंने अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण व्यापार को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया। संक्षेप में, शौका जनजाति और मध्य एशियाई हूणों के बीच रक्त या वंश का कोई संबंध नहीं है। उनके बीच का संबंध केवल इतना है कि शौका व्यापारी तिब्बतियों को ‘हुणिया’ कहते थे और तिब्बत से आने वाले माल को ‘हूण देश का माल’ कहा जाता था।

शौका जनजाति का प्राचीन शक (Scythians) जाति के साथ संबंध नृविज्ञान और इतिहास में एक अत्यंत रोचक और गहरा विषय रहा है। हालांकि आधुनिक शोधों में उनके शुद्ध नस्लीय संबंध को लेकर मतभेद हैं, लेकिन कुछ ऐतिहासिक स्रोतों और स्थानीय मान्यताओं के आधार पर उनके बीच संबंध की एक मजबूत थ्योरी दिखाई देती है। कुछ इतिहासकारों और नृवैज्ञानिकों के अनुसार ‘शौका’ शब्द की उत्पत्ति सीधे प्राचीन ‘शक’ शब्द से हुई है, जो समय के साथ भाषाई अपभ्रंश के कारण शौका में परिवर्तित हो गया। इतिहासकार आर. एस. रायपा के शोधों के अनुसार शौका मूल रूप से हिमालयी क्षेत्र के आदिवासियों जैसे किरात, नाग और यक्ष के वंशज हैं। प्राचीन काल में जब मध्य एशिया से इंडो-सीथियन यानी शक आक्रांता भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों की ओर बढ़े, तो उनकी कुछ शाखाएँ इन सुदूर हिमालयी घाटियों में भी आईं और यहाँ आकर वे स्थानीय मूल निवासियों के साथ मिल गईं, जिससे शौका समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश कालीन गजेटियरों और इतिहासकारों ने भी शौका लोगों की शारीरिक बनावट और विशिष्ट लड़ाकू व व्यापारिक प्रवृत्तियों के आधार पर उनके वंश को इंडो-सीथियन जनजातियों से जोड़कर देखा है। शक या सीथियन अपने ज़माने के बेहतरीन घुड़सवार, योद्धा और घुमंतू चरवाहे थे और इसी तरह शौका समुदाय के लोग भी कठिन बर्फीले रास्तों को पार करने वाले बेहद साहसी, व्यावहारिक और अर्ध-घुमंतू जीवन जीने वाले व्यापारी रहे हैं। हालाँकि, तिब्बत के साथ सदियों पुराने संपर्क और विवाह संबंधों के कारण शौका समुदाय में मंगोलायड लक्षण, जैसे आँखें और चेहरे की बनावट अधिक प्रभावी हो गए, जिससे उनका मूल शक स्वरूप बदल गया। वैज्ञानिक दृष्टि से शौका जनजाति को मुख्य रूप से किरात मूल और तिब्बती-बर्मी भाषाई परिवार का हिस्सा माना जाता है। इस प्रकार, प्राचीन शकों के साथ उनका संबंध जेनेटिक रूप से शुद्ध होने से कहीं अधिक ऐतिहासिक विलय (Assimilation) और भाषाई प्रभाव का है, जिसने उन्हें ‘शौका’ नाम और एक विशिष्ट साहसी पहचान प्रदान की।

◆ नीलिमा पाण्डेय, लखनऊ

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