
हल्द्वानी। उत्तराखंड के घने जंगलों के बीच बसे पुराने रेस्ट हाउस, लकड़ी ले जाने वाली पुरानी ट्रेन की पटरी, ब्रिटिश काल के वन अधिकारी और हल्द्वानी और अल्मोड़ा क्षेत्र के वन प्रभाग की शानदार विरासत । इन सबको समेटे हुए है किताब ‘जंगल डायरी’। विजेंद्र श्रीवास्तव और कमलेश मेहता द्वारा लिखित यह किताब केवल सूखे तथ्यों का संग्रह नहीं है, बल्कि जंगलों की यादों, संघर्ष और गौरव का एक जीवंत दस्तावेज है।

लेखक ने अपनी लंबी सेवा के अनुभवों को इस किताब में उतारा है और हल्द्वानी वन प्रभाग और कुमाऊं के इतिहास को विस्तार से सामने रखा है। किताब ब्रिटिश काल से शुरू होकर आज तक के वन प्रबंधन की यात्रा दिखाती है। इसमें नंधौर ट्राम-वे, टनकपुर डाम-वे, पुराने रेस्ट हाउस, बिना बिजली के पानी पहुंचाने वाली हाइड्रोलिक व्यवस्था, बुलेट प्रूफ बांस के भवन और लकड़ी की आपूर्ति से जुड़ी रोचक जानकारियां शामिल हैं। साथ ही शिशम , चीड़ की लकड़ी, शूटिंग ब्लॉक, रामपुर नवाब को दी गई छूट और वन्यजीव प्रबंधन जैसे विषय भी विस्तार से चर्चा हैं। किताब की सबसे बड़ी ताकत इसकी तस्वीरें हैं। पुरानी इंजनों, रेस्ट हाउसों, जंगलों और वन इमारतों की खूबसूरत तस्वीरें पढ़ते समय पाठक को लगता है कि वह खुद उन जगहों पर घूम रहा है। भाषा सरल, सहज और रोचक है, जिस वजह से आम पाठक भी आसानी से जुड़ जाता है।
जंगल डायरी उन पाठकों के लिए खास है जो उत्तराखंड के पहाड़ों, जंगलों और उनकी सांस्कृतिक विरासत से गहरा लगाव रखते हैं। वन विभाग से जुड़े कर्मचारियों, इतिहास प्रेमियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के लिए यह किताब संग्रहणीय है। यह किताब न सिर्फ जानकारी देती है, बल्कि जंगलों के प्रति सम्मान और लगाव भी बढ़ाती है।









