
हम आपको ऐसी दानवीर महिला जसुली शौक्याणी की कहानी बताते हैं, जो अपने दान और परोपकार से इतिहास में अमर हो गई है। उनके प्रयासों की गवाही आज भी समय देता है। जसुली देवी पिथौरागढ़ जिले के धारचूला तहसील के अंतर्गत दारमा घाटी के दांतू गांव की रहने वाली थीं। वे ‘रं’ (शौका) समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। कम उम्र में अपने पति और इकलौते पुत्र को खो दिया था। उनको व्यापार से अर्जित अपने धन को उन्होंने जनसेवा में लगाने का ऐतिहासिक संकल्प लिया।

तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर हेनरी रैमसे की सलाह पर उन्होंने दुर्गम रास्तों पर यात्रियों की सुविधा के लिए अपनी पूरी संपत्ति दान कर दी।

धर्मशालाओं का जाल और ऐतिहासिक महत्व
1870-1880 के दशक में जसुली देवी ने मानसरोवर यात्रा मार्ग, तिब्बत व्यापार मार्ग और कुमाऊं के दुर्गम रास्तों पर 300 से अधिक धर्मशालाओं और प्याऊ का निर्माण करवाया। धारचूला, मुनस्यारी से लेकर अल्मोड़ा और बागेश्वर तक, ये धर्मशालाएं इस तरह बनाई गई थीं कि एक दिन की पैदल यात्रा के बाद मुसाफिर को रात बिताने के लिए सुरक्षित ठिकाना मिल सके। ये इमारतें पारंपरिक कुमाऊंनी स्थापत्य कला (मजबूत पत्थरों और नक्काशीदार लकड़ी के शहतीरों) का बेहतरीन उदाहरण हैं। इसमें एक अल्मोड़ा जिले में अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ मार्ग पर खीनापानी नामक जगह पर बनी धर्मशाला भी है।

ऐतिहासिक विरासत को नया जीवन मिला
खीनापानी धर्मशाला (लमगड़ा, अल्मोड़ा) । अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा ब्लॉक में स्थित प्रसिद्ध खीनापानी धर्मशाला जो कभी जर्जर हो चुकी थी, उसे उत्तराखंड सरकार के संस्कृति विभाग, जिला प्रशासन और लोगों के प्रयास से संरक्षित किया गया है।
जसुली देवी का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से किया गया जनहित का कार्य सदियों बाद भी समाज को राह दिखाता रहता है।








