
पिथौरागढ़ की सोर घाटी में हर साल भाद्रपद में एक अनोखा उत्सव मनाया जाता है। कुमौड़ गाँव का हिल जात्रा मुखौटों, लोकनाट्य और आस्था का जीवंत संगम है। लगभग 500 साल पुरानी यह परंपरा कृषि जीवन, पशुपालन और पौराणिक कथाओं को एक साथ जोड़ती है। सबसे ज्यादा आकर्षण लखिया भूत का होता है, जिसके आने से पूरा माहौल बदल जाता है।

*उत्पत्ति की लोककथा*
हिल जात्रा की जड़ें नेपाल की इंद्र जात्रा में हैं। लोककथा के अनुसार कुमौड़ के चार महर भाई—कुंवर सिंह, चैहज सिंह, चंचल सिंह और जाख सिंह—नेपाल गए थे। वहाँ एक भैंसे की बलि का अनुष्ठान चल रहा था। भैंसे के मुड़े हुए सींगों के कारण गर्दन काटना मुश्किल लग रहा था। एक भाई ने एक ही वार में गर्दन काट दी। नेपाल नरेश उनकी वीरता से इतने खुश हुए कि उन्होंने उन्हें मुखौटे उपहार में दिए और उत्सव मनाने की अनुमति दे दी।
यहीं से कुमौड़ में यह परंपरा शुरू हुई। बाद में बाजेटी, डुंगरी, रावलगाँव, सतगढ़, कनालीछीना और अस्कोट जैसे गाँवों में भी फैल गई। कुछ जगहों पर इसे हिरन-चीतल के नाम से मनाया जाता है।
स्थानीय भाषा में “हिल” का मतलब कीचड़ यानी धान रोपाई का मैदान है। “जात्रा” का अर्थ उत्सव। इसलिए यह नाम पड़ा। पहले इसे हल जात्रा भी कहा जाता था क्योंकि हल खेती का मुख्य औजार है।
*कब और कैसे मनाया जाता है*
उत्सव भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) में गौरा-महेश्वर के आठ दिन बाद होता है। मुख्य स्थान कुमौड़ गाँव का खुला मैदान है।
उत्सव तीन हिस्सों में बँटा होता है:
◆पूजा और बकरे की अनुष्ठानिक बलि
◆मुखौटा नाट्य और स्वांग
◆लोकगीत, झोड़ा-चांचरी नृत्य और समापन
कलाकार खीं या खेरि पेड़ की लकड़ी से बने रंग-बिरंगे मुखौटे पहनते हैं। ये मुखौटे पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनाए जाते हैं।
*प्रमुख पात्र*
उत्सव में कई रोचक पात्र दिखते हैं:
हलवाहा (हल जोतने वाला किसान)
बैलों की जोड़ी (बड़े बल्द, छोटे बल्द और आलसी बैल)
धान रोपाई करती महिलाएँ
हुक्का पीता बूढ़ा
हिरन-चीतल
घोड़े सवार
महाकाली
इन सबमें सबसे खास है लखिया भूत।
*लखिया भूत: सबसे रहस्यमय पात्र*
लखिया भूत को भगवान शिव का गण वीरभद्र माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार जब दक्ष प्रजापति ने शिव का अपमान किया तो सती यज्ञ की अग्नि में कूद गईं। शिव ने क्रोध में अपनी जटा से वीरभद्र को पैदा किया। वीरभद्र ने दक्ष का यज्ञ नष्ट कर दिया।
स्थानीय आस्था में लखिया भूत इन्हीं वीरभद्र का रूप है। उत्सव में कलाकार विशाल काला वस्त्र, लाल आँखों वाला विकराल मुखौटा और बड़े दाँत लगाता है। दो मजबूत व्यक्ति उसे मोटी जंजीरों से बाँधकर रखते हैं। माना जाता है कि उसकी शक्ति इतनी ज्यादा है कि बिना नियंत्रण के वह अनियंत्रित हो सकता है।
जब ढोल-दमाऊं की तेज थाप के बीच लखिया भूत मैदान में आता है तो पूरा माहौल बदल जाता है। लोग सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं और घर, फसल, पशु व परिवार की सुरक्षा का आशीर्वाद माँगते हैं। लखिया भूत के आगमन के साथ ही उत्सव का चरम और समापन होता है।
*मुखौटों का महत्व*
मुखौटे सिर्फ पहनावा नहीं हैं। ये गहन अर्थ रखते हैं। मुखौटा पहनने वाला व्यक्ति अपनी पहचान छोड़कर पात्र बन जाता है। ये अदृश्य शक्तियों को रूप देते हैं और मनुष्य तथा अलौकिक दुनिया के बीच पुल का काम करते हैं।
मुखौटों के जरिए कृषि जीवन की कहानियाँ, पौराणिक कथाएँ और नैतिकता बिना शब्दों के बताई जाती हैं। नई पीढ़ी को संस्कृति सिखाने का यह जीवंत तरीका है। हास्य और भक्ति दोनों एक साथ नजर आते हैं।
*सांस्कृतिक महत्व*
हिल जात्रा सिर्फ मनोरंजन नहीं है। यह कृषि जीवन की खुशियों और कठिनाइयों को जीवंत करता है। समुदाय को जोड़ता है और पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी तक संस्कृति पहुँचाता है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड सरकार ने इसे राज्य स्तरीय उत्सव बनाने की दिशा में काम शुरू किया है।
जब जंजीरों से बँधा लखिया भूत नाचता हुआ मैदान में आता है तो लगता है जैसे पौराणिक काल का वीरभद्र खुद कुमौड़ की धरती पर उतर आया हो। हिमालय की मिट्टी, पसीने, आस्था और कल्पना का यह जीवंत नाटक देखने लायक है।
■ *नीलिमा पांडेय, लखनऊ।*









