
देहरादून। हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट के जनमत संग्रह कराने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अदालत के लिए जनमत संग्रह कराने का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का दायित्व न्यायिक मामलों का निस्तारण करना है, जबकि बुनियादी ढांचे और न्यायालय के स्थानांतरण जैसे विषय प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत तय किए जाते हैं। ऐसे मामलों में जनमत संग्रह कराने का आदेश न्यायिक अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उत्तराखंड हाईकोर्ट और राज्य सरकार आपसी समन्वय और परामर्श के माध्यम से नए न्यायालय परिसर से जुड़े सभी बुनियादी ढांचे और अन्य प्रशासनिक मुद्दों का समाधान निकालें।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में हाईकोर्ट के नए परिसर के लिए उपयुक्त भूमि पहले ही चिन्हित की जा चुकी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि संबंधित भूमि से जुड़े सभी आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) और अन्य स्वीकृतियां छह सप्ताह के भीतर पूरी की जाएं।
गौरतलब है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट की तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ऋतु बाहरी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ ने 4 मई 2024 को पारित आदेश में गौलापार की प्रस्तावित भूमि को अनुपयुक्त बताते हुए जनमत संग्रह कराने की बात कही थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की थी, जिस पर सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया।









