
पिछली असफलता के बाद एक बार फिर जोर-शोर से सुल्ताना को गिरफ्तार करने का अभियान शुरू हुआ। जिन दिनों विंडहैम मिर्जापुर के कलक्टर थे उन्होंने शेर के शिकार में मदद के लिए कोल और भुन्या जाति के दस-दस लोगों की एक बढ़िया टीम जुटा रखी थी।

मिर्जापुर के जंगलों में बसने वाली ये जातियां जंगल की बेहतर समझ रखती हैं। तो सबसे पहले विंडहैम की टीम से चार बेहतरीन लोग फ्रेडी की मदद के लिए दिए गए। जिम कॉर्बेट उनसे पहले से परिचित थे। फ्रेडी ने इन पाँच लोगों की टीम को सुल्ताना के डेरे का पता लगाने का काम सौंपा।
सुल्ताना के खेमे में भी बेचैनी की आहट थी। संभव है उन्होंने फ्रेडी की तरफ़ से आने वाले खतरे को भांप लिया हो। कारण जो भी हो सुल्ताना एक दिन से अधिक कहीं नहीं ठहर रहा था। लगभग रोज ही उसका डेरा बदल जाता। इसके लिये वे रातों-रात लम्बी दूरियां तय करते।
जिम कॉर्बेट ने फ्रेडी के सामने एक योजना रखी। योजना के तहत फ्रेडी को एक ख़बर फैलानी थी कि विंडहैम ने शेर शिकार की अपनी टीम के चारों साथियों को वापस बुला लिया है और जिम कार्बेट भी वापस लौट गए हैं। आगे इस टीम को वापसी की टिकट लेकर अपनी रवानगी दिखानी थी।
लेकिन अपने ठिकानों पर पहुँचने के बजाय अगले ही स्टेशन पर उतर का जंगल में गुम हो जाना था। आगे उनपर फ्रेडी कोई रोक-टोक नहीं लगाएगा। उन्हें खुली छूट होगी सुल्ताना को लाने की, जिंदा या मुर्दा।
फ्रेडी ने पूरी योजना सुनी। कुछ देर शान्त रहा और बाद में इस योजना पर अमल करने से मना कर दिया।
फैसले से भरी आवाज में फ्रेडी ने जिम कॉर्बेट से कहा, “नहीं। तुम लोगों की जान की हिफाजत मेरी जिम्मेदारी है। पागलपन भरे तुम्हारे इस फितूर को मैं मंजूर नहीं कर सकता।”
इस मुलाकात के तीन महीने बाद मानसून के जोर पकड़ने पर, फ्रेडी ने जंगलात महकमे के हरबर्ट, तराई और भाबर के सुपरिंटेंडेंट फ्रेड एंडरसन और जिम कॉर्बेट को हरद्वार बुलाया।
वहाँ पहुँचने इस बात का खुलासा हुआ कि फ्रेडी ने नजीबाबाद के जंगलों में सुल्ताना के पक्के अड्डे का पता लगा लिया था और वहाँ घेरा डालने के काम में और यदि सुल्ताना भाग निगलने की कोशिश करे तो उसे रोकने के काम में उसे जिम कॉर्बेट, हर्बर्ट और एंडरसन की मदद की जरूरत थी। हरबर्ट पोलो के सिद्धहस्त खिलाड़ी थे।
उनकी कमान में 50 घुड़सवारों की टुकड़ी सुल्ताना को भाग निकलने से रोकने के लिए तैनात होना थी। हरबर्ट और जिम कॉर्बेट को सुल्ताना के गिरोह को घेरने में फ्रेडी की मदद करनी थी।
अपने पुराने अनुभवों से सुल्ताना के जासूसी अमले की काबलियत के बारे में फ्रेडी को कोई शक-शुबहा नहीं बचा था। इसी के मद्देनजर फ्रेडी के दो मददगारों को छोड़कर किसी को अड्डे पर छापा मारने की योजना की खबर नहीं थी।
पूरी तरह हथियारों से लैस पुलिस फोर्स को हर शाम रूट मार्च पर भेजा जाता था। टीम के बाकी चार लोग फ्रेंडी, हरबर्ट, एण्डरसन और जिम कॉर्बेट भी उतनी ही दूर पैदल घूम कर अँधेरा होने पर डैम बंगले पर लौट आते थे। कुछ दिन इन स्वांग को दोहराने के बाद एक दिन रातों-रात फ्रेडी की टीम अपनी मुहिम पर निकल गयी।
दल-बल सहित ‘फ्रेडी की सेना’ रोज मार्च का स्वांग करते-करते रेलवे लाइन के किनारे चलते हुए हरद्वार स्टेशन के मालगोदाम जा पहुँचे। फौरन से पेश्तर अपने इंतज़ार में खड़ी मालगाड़ी में सवार होकर अपने ‘रण-क्षेत्र’ को कूच कर गए। इस रवानगी के बारे में जिम कॉर्बेट ने अपनी पुस्तक माई इंडिया में तफ़सील से लिखा है। वो दर्ज़ करते हैं कि, “यह सब काम इतनी होशियारी से अंजाम दिया गया था कि गाँव के पाही कुत्तों तक ने आवाज नहीं की।
गाँवों के ये देसी कुत्ते दुनिया के बढ़िया से बढ़िया कुत्तों से भी ज्यादा बेहतर चौकीदार साबित होते हैं। बरसाती कीचड़ में ढाई सौ जवानों के पाँवों से बने गड्डों में तेज बरसात के दौरान बमुश्किल खद-बद करते-करते ही कदम आगे बढ़ा पा रहे थे। मीलों तक हम हाथी घास में चले। घास की ऊँचाई मेरे सिर से भी ऊपर निकल रही थी।
गीली जमीन पर चलने में अपना संतुलन बनाए रखना मेरे लिए बड़ा मुश्किल होता जा रहा था क्योंकि एक हाथ से मैंने अपनी आँखों पर ओट कर रखी थी। ओट करना इसलिए जरूरी था कि हाथी घास के कड़े सिरे, उस्तरे जैसे धारदार और नुकीले थे। मैं हमेशा से फ्रेडी के 20 स्टोन 4 पाउंड वाले शरीर में भरी ताकत की तारीफ तो करता रहा हूँ, लेकिन उस रात मैं फ्रेडी कायल हो गया। यह सच है कि वह मेरे मुकाबले थोड़ी बेहतर जमीन पर चल रहा था जबकि मैं कीचड़ में था लेकिन फिर भी मुझसे 9 स्टोन ज़्यादा वजन के बावजूद फ्रेडी की फुर्ती देखने के काबिल थी।
पूरे सफर में एक बार भी कहीं फ्रेडी दम भरने को रुका नहीं। हम लोग रात के नौ बजे चले थे। अब सुबह के दो बजे रहे थे। मैंने फ्रेडी को कानों-कान संदेशा भिजवा कर पूछा कि क्या हम सही दिशा में चल रहे हैं। मैंने यह संदेशा इसलिए भेजा था क्योंकि पिछले एक घंटे से हम उत्तर दिशा छोड़कर पूरब की तरफ बढ़ रहे थे जबकि जाना हमें उत्तर की तरफ ही था।
काफी देर बाद एक-एक जवान से मुँह और कान से होता हुआ फ्रेडी का जवाब मेरे पास आया, “कप्तान साब बोलते हैं कि सब ठीक है।” कीचड़ में, कहीं पेड़ वाले तो कहीं झाड़ी वाले जंगलों, कभी ऊँची घास में दो घंटे भटकने के बाद मैंने फ्रेडी को दूसरा संदेशा भेजा। मैंने उसे कहलवाया कि वह जवानों की लाइन को रुकवा दे ताकि लाइन के अगले सिरे पर पहुँचकर उससे बात कर सकूँ।
लाइन के पिछले सिरे से आगे की तरफ जब मैं बढ़ा तो हर जवान के चेहरे पर निगाह डालता गया था। वे सब एकदम खामोश थे क्योंकि पहले ही उन्हें बता दिया गया था कि वे बोलेंगे नहीं। सबके चेहरे पर थकान पुती हुई थी। फ्रेडी और एंडरसन लाइन के अगले सिरे पर मौजूद थे। उनके साथ उनके चार रहनुमा (रास्ता बताने वाले) भी थे। फ्रेडी ने मुझसे पूछा कि, क्या कुछ गड़बड़ हो गया? मुझे मालूम था कि वह जवानों के बारे में पूछ रहा है। मैंने उसे बताया कि जवान तो ठीक हैं लेकिन बाकी सब कुछ एकदम गड़बड़ हो गया है। हम लोग पिछले कई घंटों से सिर्फ गोल-गोल घूम रहे हैं। जंगलों में अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बिताने की वजह से मुझे मालूम क कि जंगल में भटक जाना कितना आसान है। मैंने अपने तजुर्बे से ऐसा दिशा ज्ञान हासिल कर लिया था जो कि रात में भी उतना कारगर था जितना कि दिन में।
जब हम दो घंटे पहले उत्तर से पूरब की तरफ मुड़े थे तब भी मुझे दिशा बदलने का अंदाजा उतनी ही साफ तौर पर हुआ था जितना कि यह पैदल यात्रा शुरू करते वक्त जब हमने पहली बार दिशा बदली थी। घंटे भर पहले ही हम एक सेमल के पेड़ के नीचे से गुजरे थे। इस पेड़ की पहचान यह थी कि इस पर एक गिद्ध का घोंसला था। अब मैंने जब फ्रेडी को रुकने का संदेशा भिजवाया तो फिर एक बार हम लोग इसी पेड़ के नीचे थे।”
फ्रेडी के चार रहनुमाओं (रास्ता बताने वाले) में से दो सुल्ताना के गिरोह के भांतू थे। कुछ दिन पहले वे हरद्वार के बाज़ार में पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे। सुल्ताना के अड्डे पर मारे जाने वाले छापे की योजना इन्हीं दोनों से उगलवाई गई जानकारी का नतीजा थी। ये दोनों आदमी पिछले दो बरस से सुल्ताना के अड्डे पर वक्त-वक्त पर रह चुके थे। छापेमारी में सहयोग के एवज में उन्हें आज़ाद करने का वायदा किया गया था।
बाकी दो आदमी मवेशी पालने वाले थे जिनकी पूरी जिंदगी इन्हीं जंगलों में मवेशी चराते बीती थी। ये दोनों सुल्ताना को रोजाना दूध पहुँचाया करते थे। ये चारों आदमी अपनी जिद पर अड़े थे कि वे रास्ता नहीं भूले हैं। लेकिन जब उनसे और ज़्यादा पूछताछ की गई तो थोड़ा हिचकते उन्होंने कबूल किया कि जिस दिशा में फोर्स को ले जा रहे हैं उस दिशा में उन्हें यदि पहाड़ियाँ दिख जाएँ तो उन्हें बेहद खुशी होगी।”
रात का यह अँधेरा तिस पर घनी धुंध ऐसे में कोई तीस मील दूर पहाड़ियाँ दिख पाना नामुमकिन था। लेकिन अब ओखल में सर दिया जा चुका था। जरा सी असावधानी पूरी बिसात को पलट सकती तो। फ्रेडी की महीनों की मेहनत मिट्टी हो सकती थी।
जाहिर है घुमा फिरा कर ही सही रहनुमाओं ने रास्ता भटक जाने की जिम कॉर्बेट की आशंका पर मुहर लगा दी।सबके दिमाग मे एक ही सवाल था, ‘अब आगे क्या होगा?’
(क्रमशः)
◆ नीलिमा पांडेय, लखनऊ











