किताब कौतिक में गूंजे उत्तराखंड की लोकभाषाओं के सुर, नरेंद्र सिंह नेगी बोले- रचनाओं से जीवंत रखें भाषा की मिठास और व्याकरण

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देहरादून। उत्तराखंड की लोकभाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के संदेश के साथ 16वें देहरादून किताब कौतिक के दूसरे दिन दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में साहित्यिक चर्चाओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की धूम रही। क्रिएटिव उत्तराखंड के तत्वावधान में 23 से 25 अक्टूबर तक आयोजित पुस्तक मेले में कुमाऊंनी, गढ़वाली, जौनसारी, रवांल्टी, बंगाणी और पहाड़ताली भाषाओं के संरक्षण, लेखन और शिक्षण पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं के कलाकारों और रचनाकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से भाषा की मिठास और व्याकरण को जीवंत रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।

इस वर्ष किताब कौतिक की मुख्य थीम ‘आओ, दोस्ती करें किताबों से’ रखी गई है। मेले में देशभर के प्रकाशकों की हजारों पुस्तकें पाठकों के लिए उपलब्ध हैं। पुस्तक प्रेमियों के लिए साहित्यिक परिचर्चाओं के साथ विज्ञान कोना, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी गतिविधियां, नेचर वॉक, साहसिक खेल, सांस्कृतिक संध्याएं और हस्तशिल्प स्टॉल भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इसके अलावा पपेट निर्माण, भाषा-संस्कृति और वॉल पेंटिंग की कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। बालप्रहरी बाल लेखन कार्यशाला में स्कूली बच्चों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित पुस्तकों का स्टॉल भी लोगों का ध्यान खींच रहा है।

कार्यक्रम के पहले सत्र में उत्तराखंड में भाषाई लेखन और कुमाऊंनी-गढ़वाली साहित्य पर संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें मदन डुकलान, बीना बेंजवाल, भारती पांडे, दिनेश जोशी और गजेंद्र नौटियाल ने अपने विचार रखे। सत्र का संचालन आशीष सुंद्रियाल ने किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि क्षेत्रीय बोलियां और भाषाई लेखन पहाड़ की मूल आत्मा हैं। स्थानीय भाषाओं को सहेजने और उनके व्याकरण को जीवंत रखने के लिए रचनाकारों को निरंतर प्रयास करने होंगे।

दूसरे सत्र में जौनसारी, रवांल्टी, बंगाणी और पहाड़ताली भाषाओं में लेखन पर चर्चा हुई। इसमें डॉ. राजेश पाल, केशर सिंह राय, डॉ. विनोद जोशी, दिनेश सिंह रावत और आरपी विशाल ने भाग लिया। सत्र का संचालन प्रेम पंचोली ने किया। वक्ताओं ने कहा कि प्रत्येक आंचलिक बोली में पीढ़ियों का ज्ञान, इतिहास और जीवन अनुभव समाहित हैं। इन भाषाओं का संरक्षण कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

इस दौरान लेखक डॉ. युगल जोशी की पुस्तक ‘कहो कालिदास’ पर विशेष चर्चा हुई। हेम पंत ने सत्र का संचालन किया। डॉ. युगल जोशी ने साहित्य और महाकवियों की रचनाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्य केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंधों को भी अभिव्यक्त करता है।

किताब कौतिक के दूसरे दिन बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों और स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में अनिल रतूड़ी, राधा रतूड़ी, प्रो. गोविंद सिंह, डॉ. दिव्या नेगी और डॉ. दीपिका सहित कई प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं। पुस्तक मेले के माध्यम से किताबों के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ उत्तराखंड की लोकभाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।

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