
डा. नीलिमा पाण्डेय
एक दिन हिमांशु जोशी की ‘छाया मत छूना मन’ पढ़ते हुए कथावस्तु के लिखे जाने के समय-संदर्भ को बेतहर समझने के लिए हम उसका प्रकाशन वर्ष ढूंढने लगे। उपन्यास की जो प्रति मेरे पास है उसमें प्रकाशन वर्ष दर्ज़ नहीं है। महज चौदहवाँ संस्करण , 2020 लिखा है। इसे भारतीय ज्ञान पीठ ने प्रकाशित किया है। इंटरनेट पर भी खोजने की कोशिश की। तलाश की इस प्रक्रिया में प्रकाशन वर्ष तो नहीं दिखा लेकिन ये संस्मरण मिल गया जिसे विजय अग्रवाल जी ने लिखा है। पढ़ा जाए..
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यह सन् 1977 के दिनों की बात है, जब मैं हिन्दी साहित्य में एम.ए. कर रहा था. मुझे लगभग हर महीने अपनी दुकान की खरीदी के लिए कलकत्ता (कोलकाता) जाना पड़ता था. इस बार जब मैं जा रहा था, तो मेरे साथ पढ़ने वाली एक लड़की ने, जो बहुत ही साहित्य प्रेमी थी, मुझसे कलकत्ता से एक किताब लाने को कहा और वह भी उसकी चौदह प्रतियां. मैं चौंक गया. सच पूछिए तो तब तक मेरे साहित्य का ज्ञान स्कूली किताबों से इंच भर भी न तो आगे था और न ही ऊपर.
चूंकि अनुरोध एक लड़की का था, जो उस जमाने में बहुत बड़ी बात हुआ करती थी, और उसके इस ‘आदेशनुमा अनुरोध’ ने मुझे देखते ही देखते कॉलेज में चर्चित कर दिया था, इसलिए उसे पूरा करने के लिए पूरे कलकत्ता की खाक छानकर मैं कुल जमा बारह प्रतियां ही इकठ्ठी कर पाया. उस लड़की ने बसंत पंचमी के उत्सव पर उसकी एक-एक कॉपी हम सभी क्लास वालों को उपहार में दी. दो लोग इससे इस वायदे के साथ वंचित रह गए, ‘उन्हें अगले महीने मिल जाएगी.’ भाग्य से मैं अगले महीने वालों में शामिल नहीं था. मैं उसमें शामिल होना भी नहीं चाहता था.
इसका कारण यह था कि मैं इस उपन्यास को पढ़ने को बेहद बेताब था. इसलिए नहीं कि मुझे उपन्यास अच्छे लगते थे. बल्कि सिर्फ इसलिए कि आखिर वह कौन ऐसा खुशकिस्मत लेखक है, जिसकी दीवानी वह लड़की है, जिस लड़की का दीवाना चार हजार लड़कों वाला पूरा कॉलेज था.
जब मैं सिविल सर्वेंट बनकर दिल्ली गया, तो मेरी सबसे बड़ी और एकमात्र निजी इच्छा यह थी कि मैं उस उपन्यास के लेखक से मिलूं. मैं उनसे मिला भी, और मिलकर हतप्रभ रह गया. और बाद में लगातार उनसे मिलता रहा.
इस लेखक का नाम था – हिमांशु जोशी और उनके उस उपन्यास का नाम था ‘छाया मत छूना मन’. बाद में जब मैंने उनसे इस घटना का जिक्र किया, तो सुनकर वे कुछ इस तरह शर्माए, मानो कि मैं उनकी इस उम्र में (55 साल) उनके लिए किसी के प्रेम का अनुरोध लेकर आया हूं. कुल मिलाकर मेरे लिए ये थे- हिमांशु जोशी, और मेरे लिए अंत तक वे यही बने रहे.
23 नवंबर को जैसे ही उनके निधन की खबर को आंखों ने पढ़ा, वैसे ही लगा कि दिल के अंदर से कहीं चटक की धीमी किन्तु बहुत तीखी आवाज आई हो. पता नहीं क्यूं, कुछ ऐसा भी लगा, मानो कि मेरे अंदर का लेखक अचानक कुछ कमजोरी महसूस कर रहा है. आज उनके न रहने पर, जब मैं उनके बारे में सोच रहा हूं, तो बार-बार मेरा मन मुझसे एक सवाल कर रहा है, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि उस लड़की की इस अनदेखे लेखक के प्रति दीवानगी ने ही तुम्हें लेखक बनने के लिए उकसाया था?’
इस प्रश्न के उत्तर के रूप में कहा गया यह एक सच्चा शब्द ‘हां’ ही मेरी उनको दी गई पहली एक कृतज्ञ श्रद्धांजलि है.
हिमांशु जी, अब मैं आपके नगर में नहीं रहता. लेकिन जहां मैं रहता हूं, वहां वह लड़की जरूर रहती है, जिसने मुझे आपसे मिलवाया था. अब आपसे तो कभी मिलना मुमकिन हो नहीं पाएगा. किन्तु आपके न रहने की खबर पढ़ने के बाद मैं उस लड़की से मिलने गया था. हम दोनों ने “छाया मत छूना मन” के बारे में खूब बातें की. यह आपको हम दोनों की पहली संयुक्त किन्तु मेरी दूसरी श्रद्धांजलि है.
अब आखिरी में एक सवाल हिमांशु जी कि ‘ऐसे भी किसी के मन को भला क्या छूना.’
(डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं)
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पहली बार हिमांशु जी से हमारा परिचय ‘तुम्हारे लिए’ उपन्यास से हुआ। उसे पढ़ते हुए ये नाम हमेशा के लिए स्मृति में रच-बस गया। ‘तुम्हारे लिए’ ने ही उत्तराखंड के भौगोलिक परिवेश से पहला परिचय करवाया था। प्रेम के महीन रेशमी धागों से बुना गया ये उपन्यास इतनी कम उम्र में पढ़ा गया था कि आज भी जेहन में अपने रूमान को बनाए हुए है। ‘छाया मत छूना मन’ मे भी प्रेम है पर उस पर दुःख छाया इतनी गहरी है कि वह बेहद धुंधला सा दिखता है। विस्तार से फ़िर कभी..
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पुनश्चः
उम्मीदों से रीते टूटे कच्चे घर। आकाश की झीनी छत के नीचे आसरा ढूढ़ते हुए । धरती पर कच्ची मिट्टी की मैली चादर। दो जून रूखी-सूखी मिल पाना भी मुश्किल। मर-मर कर जीने वालों की व्यथा-कथा है ‘छाया मत छूना मन ‘। विस्थापन , गरीबी , बेरोजगारी , बेबसी , लालसा और नैतिकता के बीच भुथरी होती मानवीय संवेदना के समानांतर चलती जीवन की धड़कन है यह।
ख़ास बात ये है की यहाँ न तो न दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर दयनीय दिखाया गया है और न ही आदिम इच्छाओं की पूर्ति को नैतिकता के तीरों से बेधा गया है। दोनों के संदर्भ सहज तरीके से रख दिए गए हैं। आप अपनी संवेदना नैतिक बोध और कंडीशनिंग के बरक्स निर्णय और विश्लेषण करने को स्वतंत्र हैं। लेखक ने अपनी तरफ़ से कोई दबाव नहीं बनाया है। उत्तेजना उद्वेलन जैसे भाव कम हैं। क्रोध हास्य प्रेम नाराज़गी सारे भाव सम पर व्यक्त हैं। स्त्री पात्रों पर कोई नैतिक दबाव नहीं बनाया गया है। मुख्य चरित्रों के रूप में वही हैं। ज्यादातर पुरुष पात्र पृष्ठभूमि में है। मुखर होने के बावजूद समाज के परिपेक्ष्य में स्त्रियों का दर्जा दोयम ही है। नैतिकता वाला सन्दर्भ मुझे ख़ास लगा इसलिए प्रकाशन वर्ष को ढूढ़ने की कोशिश की (जो फ़िलहाल नहीं मिला है)। दूसरी ख़ास बात भावनाओं के अतिरेक की अनुपस्थिति है।
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हिमांशु जोशी (४ मई १९३५ – २३ नवम्बर २०१८) हिन्दी के ख्यातिलब्ध कहानीकार, उपन्यासकार और पत्रकार थे। उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की थी। वे लंबे समय तक हिंदी पत्रिका ‘कादम्बिनी’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के संपादन से जुड़े रहे। बाद के दिनों में उन्होंने ‘वागर्थ’ के संपादन का भी दायित्व संभाला। देहावसान से कुछ समय पूर्व तक वे नार्वे से प्रकाशित पत्रिका ‘शांतिदूत’ के सलाहकार संपादक रहे।
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