
डॉ. नीलिमा पांडेय की पुस्तक “स्त्री : मिथक और यथार्थ” (सेतु प्रकाशन, 2025) भारतीय स्त्री विमर्श में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह न तो मिथकों की अंधभक्ति करती है और न ही उन्हें पूरी तरह खारिज करती है। बल्कि पुराणों, महाकाव्यों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों और लोक, परंपराओं के बहुस्रोतीय विश्लेषण के माध्यम से वह मिथक और यथार्थ के बीच का जटिल संबंध उजागर करती हैं। लेखिका पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्री की यौनिकता, स्वायत्तता और सामाजिक भूमिका को आदर्श स्त्री (पतिव्रता, सहनशील, त्यागमयी) के नाम पर किस प्रकार नियंत्रित किया गया, इसे बिना अतिरंजना के दिखाती हैं। यह भी स्पष्ट करती हैं कि स्त्री का यथार्थ उसकी चेतना, प्रतिरोध और बहुआयामी व्यक्तित्व को कभी पूरी तरह दबाया नहीं जा सका।अहल्या कथा का विश्लेषण इस पुस्तक का एक क्लासिक उदाहरण है। इसे पितृसत्ता, यौनिक सहमति/छल, और “उद्धार” (राम द्वारा) के नाम पर नियंत्रण का प्रतीक बताया गया है। देव-ऋषि द्वंद्व और स्त्री पर यौनाधिकार की प्राचीन लड़ाई को उजागर करना पुस्तक की बौद्धिक ईमानदारी को दर्शाता है।
पुस्तक के सबसे प्रभावशाली हिस्से वे अध्याय हैं जहाँ अहल्या, द्रौपदी, कुंती, सीता, मंदोदरी, सावित्री, दमयंती आदि को केवल पीड़िता या आदर्श पतिव्रता के रूप में नहीं, बल्कि जटिल, ओजस्वी, बौद्धिक और प्रतिरोधी व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया है। मंदोदरी का बहुरूपी विश्लेषण (वाल्मीकि रामायण बनाम तेलुगु, ओड़िया और लोक परंपराएँ) और सीता के साथ उसके संबंध का अध्ययन विशेष रूप से रोचक है। इतिहासकार होने के नाते डॉ. नीलिमा पांडेय की विभिन्न स्रोतों और क्षेत्रीय परंपराओं को एक साथ जोड़ने की यह क्षमता पुस्तक को समृद्ध बनाती है। भाषा शैली और पहुंच भाषा विद्वत्तापूर्ण लेकिन सुगम है। पाठक किताब को बिना थके पढ़ सकता है। यह लेखिका का दुर्लभ गुण है। वह पाठक को अंत तक बांधकर रखती हैं।स्त्री: मिथक और यथार्थ उन सभी को एक बार जरूर पढ़नी चाहिए जो भारतीय माइथोलॉजी, स्त्री विमर्श, इतिहास और संस्कृति में गहरी रुचि रखते हैं।
यह पुस्तक न केवल अतीत की पड़ताल करती है, बल्कि वर्तमान में स्त्री की स्थिति को समझने का एक बौद्धिक आईना भी प्रस्तुत करती है। यह किताब महिलाओं के मिथकीय चित्रण को चुनौती देती है और उनके यथार्थ पक्ष को उजागर करती है।








