पुण्यतिथि : गिर्दा की याद में ‘सावनी सांझ’, गूंजेंगे उनके अमर जनगीत

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नैनीताल/ हल्द्वानी । उत्तराखंड के जनकवि गिरीश चंद्र तिवारी ‘गिर्दा’ की आज 16वीं पुण्यतिथि है। राज्यभर में विभिन्न संस्थानों और संस्कृतिकर्मियों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। गिर्दा की कविताओं और गीतों ने उत्तराखंड आंदोलन, चिपको और वन बचाओ आंदोलनों में जनमानस को जोड़ा था।

गिर्दा का जन्म 10 सितंबर 1945 को अल्मोड़ा जिले के हवालबाग ब्लॉक स्थित ज्योली गांव में हुआ था। वे कवि, गीतकार, गायक, नाटककार, रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। 22 अगस्त 2010 को उनका निधन हो गया। उनकी रचनाएं आज भी पहाड़ों की फिजाओं में गूंजती हैं।गिर्दा की प्रसिद्ध कविता “जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा” शिक्षा व्यवस्था पर एक मास्टरपीस मानी जाती है। इसमें उन्होंने बच्चों के बोझिल स्कूल सिस्टम, रटंत शिक्षा और दिखावे के खिलाफ आवाज उठाते हुए एक खुले, सच्चे और आनंदपूर्ण स्कूल की कल्पना की है।

जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न अक्षर कान उखाड़ें, ऐसा हो स्कूल हमारा
आंदोलनों ने गिरीश तिवारी को ‘गिर्दा’ यानी जनता का कवि बना दिया। 1977 के वन नीलामी विरोध में लोगों के सुझाव पर गिर्दा ने गौर्दा की पुरानी कविता को नए रूप में रचकर गाया, जो आंदोलन का प्रतीक बन गया। दोनों ने मिलकर ‘हमारी कविता के आंखर’ जैसी किताबें भी संपादित की थीं।

आज हिमालय संग्रहालय और अन्य संस्थाओं द्वारा गिर्दा की स्मृति में पोस्टर प्रदर्शनी, गीत गायन और चर्चा कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। लोग उनकी कविताओं के माध्यम से जल, जंगल, जमीन और शिक्षा के सरोकारों को फिर से याद कर रहे हैं।गिर्दा की रचनाएं ‘जैंता एक दिन तो आलो’, ‘आज हिमाल तुमन कै धतयु छो’ और ‘उत्तराखंड मेरी मातृभूमि’ आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं।

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