देवीधुरा की बग्वाल : रक्षाबंधन पर पत्थर युद्ध

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उत्तराखंड के चंपावत जिले स्थित देवीधुरा में श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) पर आयोजित बग्वाल (पाषाण युद्ध) एक अनूठी लोक-धार्मिक परंपरा है। यह चार खामों—वालिक, चम्याल, लमगड़िया और गहड़वाल—के बीच सीमित समय का नियंत्रित संघर्ष है, जिसमें पहले पत्थर और अब मुख्यतः फल-फूल फेंके जाते हैं। लोक-मान्यताओं के अनुसार यह प्राचीन नरबलि प्रथा का प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन है, जिसमें एक मनुष्य के बराबर रक्त देवी बाराही को अर्पित किया जाता है।

उपलब्ध लोककथाओं, मानववैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर बग्वाल के ऐतिहासिक विकास, प्रतीकात्मक परतों, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कार्यों तथा आधुनिक अनुकूलन का विश्लेषण किया जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि बग्वाल आस्था, सामूहिक पहचान, नियंत्रित हिंसा और सांस्कृतिक निरंतरता का बहुस्तरीय प्रतीक है, जो बाहरी दबावों के बावजूद मूल भाव को बनाए रखते हुए जीवित है।

बग्वाल कुमाऊँ क्षेत्र की लोक-संस्कृति का विशिष्ट उदाहरण है। देवीधुरा के बाराही देवी मंदिर प्रांगण (खोलीखांड-दूबाचौड़ा मैदान) में आयोजित यह अनुष्ठान मात्र शारीरिक संघर्ष नहीं, बल्कि धार्मिक अर्पण, सामाजिक संगठन और ऐतिहासिक स्मृति का मिश्रण है। लोक विश्वास के अनुसार यह प्रथा मध्ययुगीन या उससे भी प्राचीन काल से चली आ रही है और नरबलि से प्रतीकात्मक रक्तदान में परिवर्तित हुई। अंग्रेजी शासन काल में कई स्थानों पर प्रतिबंध के बावजूद स्थानीय आस्था ने इसे बचाए रखा। 2013 के उच्च न्यायालय के आदेश के बाद पत्थरों के स्थान पर फल-फूल का प्रयोग बढ़ा, फिर भी मूल प्रतीक (रक्त/बलि का भाव) बना रहा। इन तत्वों को व्यवस्थित कर मानववैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विश्लेषण संभव है।

बग्वाल की ऐतिहासिकता लिखित दस्तावेजों से अधिक मौखिक लोक-मान्यताओं पर आधारित है। कोई पुरातात्विक या समकालीन ब्रिटिश रिकॉर्ड देवीधुरा में वास्तविक नरबलि की प्रत्यक्ष पुष्टि नहीं करता। फिर भी स्थानीय विश्वास के अनुसार चंद शासन काल (लगभग 15वीं–18वीं शताब्दी, 1790 की गोरखा विजय से पहले) तक महर और फर्त्याल जातियों द्वारा बारी-बारी से श्रावणी पूर्णिमा पर नरबलि दी जाती थी। कुछ स्रोत इसे कत्यूरी काल, मध्ययुगीन युग या पौराणिक महाभारत काल से जोड़ते हैं। बाराही मंदिर की संरचना 8वीं–9वीं शताब्दी की मानी जाती है।
बाराही (वाराही) देवी सप्तमातृकाओं में से एक हैं और विष्णु के वराह अवतार की शक्ति मानी जाती हैं। पृथ्वी-स्वरूपा तथा उग्र-रक्षक रूप में वे असुरों के विनाश, बाधा-निवारण, सुरक्षा और समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं।

देवीधुरा मंदिर गुफा-मंदिर है। दो विशाल चट्टानों के बीच प्राकृतिक त्रिभुजाकार द्वार को देवी की योनि-प्रतीक मानकर पूजा जाता है। मुख्य प्रतिमा संदूक में रखी रहती है; खुली आँखों से देखने पर दृष्टि जाने का भय है। साल में एक बार (बग्वाल के अगले दिन) इसे स्नान कराया जाता है। घी की आहुति चट्टानों से रिसकर बाहर निकलती है, जिसे देवी के चरण माना जाता है। लगभग 2000–2500 मीटर ऊँचाई पर देवदार-बांज वनों से घिरा यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में मान्य है।

किंवदंती के अनुसार क्षेत्र में बावन हजार वीर और चौंसठ योगिनियों के आतंक से मुक्ति के लिए देवी ने नरबलि माँगी। चार खामों में बारी-बारी से बलि दी जाती थी। जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते बेटे/पौत्र की बारी आई, तो उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने नरबलि बंद कर पत्थर युद्ध से एक मनुष्य के बराबर रक्त अर्पित करने का विकल्प दिया। इस प्रकार बग्वाल की शुरुआत हुई।

कुमाऊं में कभी लगभग 20 स्थानों पर बग्वाल प्रचलित थी (सोमेश्वर, बग्वाली पोखर, स्याल्दे आदि)। ब्रिटिश शासन में अधिकांश बंद हो गईं; देवीधुरा वाली धार्मिक महत्व के कारण बची रही। कुछ इतिहासकार इसे प्राचीन योद्धा-प्रथा या अश्म-युद्ध परंपरा से भी जोड़ते हैं।

बग्वाल कुमाऊँ क्षेत्र का बहु-स्तरीय प्रतीक है:

रक्त और बलि का प्रतिस्थापन

वास्तविक नरबलि के स्थान पर प्रतीकात्मक रक्तदान। रक्त को जीवन-शक्ति (प्राण) माना जाता है, जो देवी को शक्ति देता है और समुदाय की रक्षा सुनिश्चित करता है। घायल होना आशीर्वाद माना जाता है, क्योंकि रक्त देवी को अर्पित हो रहा है। यह शक्ति/तांत्रिक परंपराओं में रक्त-बलि के प्रतीकात्मक रूपांतरण का शास्त्रीय उदाहरण है।

नियंत्रित हिंसा

समय सीमित (5–10 मिनट), नियम निश्चित, ढालें (फर्रे) सुरक्षा के लिए और पुजारी के शंख पर तुरंत समाप्ति। अंत में सभी गले मिलते हैं। इसे संघर्ष से एकता का संदेश माना जा सकता है। मानवविज्ञान में इसे “symbolic combat” कहा जाता है, जहाँ हिंसा का प्रदर्शन समुदाय को शुद्ध और मजबूत बनाता है।

सामूहिक पहचान और भाईचारा

चार खाम रंग-बिरंगी पगड़ियों से पहचाने जाते हैं और दो पक्षों में बँटते हैं। तनाव को अनुष्ठान में अभिव्यक्त कर फिर एकजुट होना, अर्थात “हम बनाम वे” से “हम सब एक” में रूपांतरण। यह सामाजिक सद्भाव और विभिन्न समूहों के सहयोग का प्रतीक है।

रक्षाबंधन के दिन इस मारधाड़ के बाद सामूहिक मिलाप सामुदायिक रक्षा का विस्तार दर्शाता है। योद्धाओं का पारंपरिक वेश और ढाल योद्धा-साहस का प्रतीक हैं। मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर आयोजन पूरे कार्यक्रम को धार्मिक बनाता है। यहाँ कोई विजेता-पराजित नहीं है। यह देवी के प्रति एक सामूहिक अर्पण है।

देवीधुरा की यह परंपरा अनुकूलन और परिवर्तन का उदाहरण है। नरबलि से शुरू हुई परंपरा आज फल-फूल, सब्जी और सीमित मात्रा में पत्थरों से युद्ध करती दिखाई देती है। यद्यपि इसे नियंत्रित करने में 2013 के न्यायालय आदेश की महत्वपूर्ण भूमिका है।

आज भी कुछ पत्थर का प्रयोग “रक्त बिना अनुष्ठान अधूरा” की मान्यता को दर्शाता है। आधुनिक शिक्षा के दबाव के बावजूद परंपरा का जीवित रहना सांस्कृतिक गर्व और सामूहिक आस्था का प्रतीक है। मानवविज्ञान में ऐसी परंपराएँ सामान्य हैं, जहाँ वास्तविक बलि प्रतीकात्मक रूप ले लेती है, पर “बलि” का भाव बना रहता है।

कुमाऊँ में पहले कई स्थानों पर बग्वाल थी। अल्मोड़ा के पाटिया (ताकुला) में गोवर्धन पूजा पर नदी किनारे पत्थर युद्ध की परंपरा थी; इस युद्ध में जो पहले पानी पी ले, वह विजेता माना जाता था। सोमेश्वर, बग्वाली पोखर, स्याल्दे आदि में भी मिलती-जुलती परंपरा रही है। किन्तु अधिकांश अब बंद हैं या हल्के प्रतीकात्मक रूप में जारी हैं। देवीधुरा बग्वाल सबसे जीवंत और धार्मिक महत्व वाली है, क्योंकि यह सीधे बाराही की बलि-परंपरा से जुड़ी है। ये सभी कुमाऊँ की प्राचीन योद्धा संस्कृति, सामूहिक एकता और आस्था को दर्शाती हैं।

वस्तुतः बग्वाल बलि, साहस, एकता और आस्था का मिश्रण है। यह प्राचीन रक्त-बलि प्रथा को आधुनिक, मानवीय और स्वीकार्य रूप में जीवित रखता है। प्रतीक इतने मजबूत हैं कि कानूनी और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद मूल भावना बनी हुई है। यह दिखाता है कि समुदाय अपनी आस्था को समय के साथ नया अर्थ देते हुए बचाए रखते हैं। आधुनिक शिक्षा और कानूनी दबाव के बावजूद ये मान्यताएँ जीवित हैं, क्योंकि वे समुदाय को अर्थ, पहचान और एकजुटता प्रदान करती हैं। बग्वाल उत्तराखंड की अनोखी लोक-संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।

नोट: नरबलि की कोई लिखित ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है; यह मौखिक परंपरा का हिस्सा है।

■ नीलिमा पांडेय
लखनऊ

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