अमीरों को तरक्की, जनता पर कटौती का बोझ बढ़ाने वाला बजट : डॉ कैलाश पाण्डेय

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हल्द्वानी । केंद्रीय बजट 2026 हाल के वर्षों की उसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाता है—ऐसी आर्थिक वृद्धि जो न्यायविहीन है और ऐसी राजकोषीय नीतियाँ जो स्पष्ट रूप से अमीरों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में झुकी हुई हैं। पिछले एक दशक में कॉरपोरेट टैक्स की दरों में भारी कटौती की गई है, लेकिन निजी निवेश और रोजगार सृजन उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं। इसके बावजूद बजट 2026 में एक बार फिर बड़े कॉरपोरेट्स को प्रोत्साहन, रियायतें और नीतिगत समर्थन देने को प्राथमिकता दी गई है, जबकि वेतन वृद्धि ठहरी हुई है और खासकर युवाओं में बेरोज़गारी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्रों में खर्च जनसंख्या की ज़रूरतों के अनुपात में अपर्याप्त बना हुआ है। भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय आज भी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है, जिसके कारण करोड़ों लोग इलाज के लिए अपनी जेब से खर्च करने को मजबूर हैं। इसी तरह, सरकारी स्कूलों और उच्च शिक्षा के लिए आवंटन नामांकन की संख्या और बढ़ती लागत के अनुरूप नहीं है।

देश की लगभग आधी कार्यबल आबादी को रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र के लिए बजट में किसानों की आय सुनिश्चित करने का कोई ठोस उपाय नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कोई कानूनी गारंटी नहीं दी गई है, बढ़ती कृषि लागतों से निपटने के लिए कोई निर्णायक हस्तक्षेप नहीं है, और छोटे व सीमांत किसानों को कॉरपोरेट वर्चस्व से बचाने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

जहाँ एक ओर देश में संपत्ति का संकेंद्रण तेज़ी से बढ़ा है और राष्ट्रीय संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा अब बेहद सीमित बड़े कॉरपोरट के हाथों में सिमट गया है, वहीं दूसरी ओर GST जैसे अप्रत्यक्ष करों का बोझ मेहनतकश गरीबों और मध्य वर्ग पर असमान रूप से डाला जा रहा है।

कुल मिलाकर केंद्रीय बजट 2026 एक नवउदारवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें असमानता को स्वीकार्य “साइड इफेक्ट” मान लिया गया है। यह बजट गरीबी खत्म करने के बजाय उसे केवल प्रबंधित करने की नीति अपनाता है और जनकल्याण के बजाय कॉरपोरेट मुनाफ़े को बढ़ावा देता है।

वास्तव में देश को आज एक जन-केंद्रित बजट की सख़्त ज़रूरत है—ऐसा बजट जो रोजगार सृजन, सम्मानजनक मज़दूरी, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, विस्तारित खाद्य सुरक्षा और संपत्ति व मुनाफ़े पर प्रगतिशील कर व्यवस्था को प्राथमिकता दे। इस बुनियादी बदलाव के बिना आर्थिक विकास कुछ लोगों के लिए ही फायदेमंद बना रहेगा और बड़ी आबादी गरीबी में जीने को अभिशप्त रहेगी साथ ही इससे लोकतंत्र भी कमजोर होता जाएगा।

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