उत्तराखंड के जल स्रोत : मंगरा, नौला और धारा की विरासत

खबर शेयर करें -

◆ डॉ. नीलिमा पांडेय, प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय

देहरादून। उत्तराखंड में पेयजल हासिल करने के लिए नौलो-धारो की परंपरा रही है। हिमालयी क्षेत्र में गांवों की बसावट का सर्वेक्षण किया जाए तो इस बात की जानकारी मिलती है कि गांव बनने की प्रक्रिया में आवासीय भवन पहले-पहल इन्हीं जल स्रोतों के आसपास विकसित हुए। उत्तराखंड में स्थानीय लोग इन्हें मंगरा, नौला या धारा कहते हैं। पूरे हिमालय क्षेत्र में इनकी संख्या पांच लाख के आसपास अनुमानित है। इतिहासकार ये मानते हैं कि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ज्यादातर नौले मध्यकाल में बने।

♦️नौला, चुपटौल, मंगरा अथवा धारा

◆ उत्तराखंड में परंपरागत जल स्रोत नौला कहलाता है। नौला ऐसे स्रोत पर बना होता है, जहां पानी जमीन से रिस-रिस कर पहुंचता है। अपनी संरचना में नौला कुछ-कुछ बावड़ी की तरह ही होता है। यह आमतौर पर तीन तरफ से पत्थरों की दीवार से घेर दिया जाता है। ऊपर से स्लेट की छत डाल दी जाती है। भीतर जिस जगह जल एकत्रित होता है उसका आकार वर्गाकार पिरामिडिकल होता है, जो ऊपर की ओर चौड़ा रहता है तथा नीचे की ओर क्रमशः धीरे-धीरे संकरा होता जाता है।

◆ नौले का एक दूसरा प्रारूप भी मिलता है जिसको चुपटौल कहते हैं। नौले की तुलना में चुपटौल अपनी बनावट में अनगढ़ होता है। इसमें जल स्रोत के पास गड्ढा करके सपाट पत्थरों की बैठ बनाकर पानी को रोक दिया जाता है। इसमें छत का अभाव होता है।

◆ धारे अथवा मंगरे उत्तराखंड के सर्वाधिक प्रचलित पारंपरिक जल स्रोत हैं। यह जमीन की सतह से थोड़ा ऊंचाई पर बने होते हैं। पहाड़ का भूमिगत जल जब स्रोत के रूप में फूटकर बाहर निकलता है तो उसे यहां के निवासी पत्थर अथवा लकड़ी का पतनाला बनाकर उस जल को धार का रूप प्रदान कर देते हैं ताकि उसके नीचे जलपात्र रखकर पानी आसानी से भरा जा सके।

♦️ एक हथिया नौला

शिल्प एवं वास्तु के दृष्टिकोण से एक बेहद खूबसूरत नौला चंपावत के करीब देखा जा सकता है। स्थानीय लोग इसे आम बोलचाल में ‘एक हथिया नौला’ कहते हैं।

मानव सभ्यता के विकास में जल स्रोतों की अभिन्नता से हम सब वाकिफ हैं। जल है तो जीवन है इसीलिए “जल ही जीवन है” की उक्ति गढ़ी गई और जल में दैवत्व का आरोपण किया गया। क्रमशः नदी-समुद्र सब देवता की तरह पूजे जाने लगे। मैदान में सभ्यताएं नदियों के किनारे बसीं और पहाड़ों में नौलों के करीब छुटपुट गांव उग गए। आबादी के इन हिस्सों के नाम भी ऐसे पड़े जप-नौला, धारा-नौला वगैरह, जो रोजमर्रा की जिंदगी में नौले के महत्व को रेखांकित करते हैं।

आमतौर पर नौले की संरचना को तीन तरफ पत्थर से घेर दिया जाता है। भीतर का हिस्सा गहराई में संकरा होता है। उसी में पानी जमा होता है। चूंकि जल पवित्रता और कर्मकांड से अभिन्न है, इसलिए कभी-कभी नौले को कलात्मक मंदिर का रूप भी दे दिया जाता है।

चंपावत का ‘एक हथिया नौला’ कुछ ऐसा ही है। किंवदंती है कि इसे बनाने वाले शिल्पी का एक हाथ कटा हुआ था इसलिए यह एक हथिया नौला कहलाया। किंवदंती का विस्तार यह है कि जिस शिल्पी ने चंपावत के खूबसूरत बालेश्वर मंदिर को गढ़ा था उसका एक हाथ राजा ने अपने दुष्ट सामंतों के कहने पर कटवा दिया। इस दारुण स्थिति से भयभीत शिल्पी विपन्न अवस्था में अपनी अल्पवयस्क पुत्री को साथ लेकर प्राणभय से जंगल के आश्रय में आ गया। जंगल प्रवास के दौरान ही उसने एक हथिया नौले के विशिष्ट शिल्प को प्रतिरूप में जन्म दिया।

♦️ महाकाव्य महाभारत से जुड़ाव

उत्तराखंड के अनेक पूज्य स्थल ऐसे हैं, जो महाकाव्य महाभारत से अपनी अभिन्नता दर्शाते हैं। एक हथिया नौला से जुड़ी हुई एक लोक मान्यता के अनुसार, ‘पांडव जब इस क्षेत्र में आए थे तब उन्होंने देवालयों के निर्माण की ऐसी परंपरा को जन्म दिया जिसमें देवालय बनाने का काम एक रात में ही संपन्न किया जाता था। यह प्रथा कुमाऊं के शासक वंश चंद राजाओं के समय तक चलती रही।

एक हथिया नौले का निर्माण चंद शासकों के शासन काल में हुआ। नौले के संबंध में भी यह आम धारणा है कि इसका निर्माण एक रात में ही किया गया था। किंतु रात भर में इसे पूर्ण रूपेण बनाया नहीं जा सका। इस वजह से इसके गर्भगृह में प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जा सकी। वह खाली ही रहा।

एक हथिया नौला अपने कलात्मक और शिल्पगत सौंदर्य की वजह से सब का मन मोह लेता है। इसके प्रवेश द्वार के दोनों ओर अलग-अलग रथिकाओं में गणेश की मूर्तियां सज्जित हैं। बरामदे में लघु देवालय नुमा संरचना है। इसका अनुमानित समय 13वीं-14वीं शताब्दी ईस्वी बताया जाता है। यह अनुमान प्रतिमाओं और भित्ति पर किए गए अलंकरण के आधार पर लगाया गया है।

नौले और बालेश्वर मंदिर, दोनों की प्रतिमाओं का तुलनात्मक अध्ययन इन इनके तिथि निर्धारण में सहायक है। हथिया नौले से प्राप्त एक सूर्य प्रतिमा बेहद आकर्षक है। इस प्रतिमा पर ईरानी प्रभाव है अर्थात् सूर्य को बूट (लंबा जूता/उदीच्य धारी) धारण किए हुए दर्शाया गया है।

♦️ एक हथिया नौले का वास्तु एवं कलात्मक विशिष्टताएं

● वास्तुकला की दृष्टि से इस नौले की संरचना जगती पर आधारित है।

● तलांड़ योजना में वर्गाकार जलाशय दो स्तंभों पर आधारित वितान सहित बनावय गया है। कुड के चारों ओर प्रशासित प्रस्तर खंड की दीवारें हैं।

● स्तंभों पर आधारित मंडप है। द्वार के दोनों ओर दो छोटे-छोटे चबूतरे बनाए गए हैं।

● शिल्प एवं शैली की दृष्टि से स्मारक की संपूर्ण भित्तियां मंदिरों की अनुकृतियों, मानवाकृतियों एवं विभिन्न प्रकार की नक्काशी से सुसज्जित हैं। दो मीटर ऊंची दीवारों को दो भागों में बांटा गया है।

●निचले हिस्से में सादा बाड़नुमा अलंकरण है। सादी पट्टी के ऊपर मानवाकृतियां बनाई गई हैं। इसमें नृत्यांगनाओं, वादिकाओं तथा पूजन के लिए तैयार स्त्रियों एवं देवकुलियों के चित्र हैं।

● सामान्य मानवाकृतियां भी अलंकृत की गई हैं। प्रवेशद्वार को देवकुलिकाओं की आकृतियों से सजाया गया है।

●छत आकार में वृत्ताकार है। इसमें पक्षी युगल, मिथुन आकृतियां, विद्याधर आदि बनाए गए हैं।

● प्रवेशद्वार की रथिकाओं में गणेश स्थापित किए गए हैं।

● मंडप की दीवारों पर भी भीतरी दीवार की तरह ही देवकुलिकाएं बनाई गई हैं। मंडप की छत को सोपानों में उठाया गया है।

● इसमें नृत्यांगनाओं के चित्र विशेष रूप से दर्शनीय हैं।

● द्वितीय पट्टी में कुल्हाड़ी जैसी वस्तु हाथ में लिए आकृति है।

● तृतीय पंक्ति में सर्पशृंग पुरुष, बरामदे में अश्वारोहियों की मूर्तियां बनाई गई हैं।
● वितान में संकुचित शीर्ष वाली पांच नर्तकियां भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। स्त्री आकृतियां अलंकरण के साथ प्रदर्शित हैं। उनके वस्त्राभूषण (वस्त्र और पैर में पहनी गई पाजेब) शिल्पगत दक्षता की परिचायक हैं।

सम्बंधित खबरें