
सुल्ताना को अपने शिकंजे में लेने का फ्रेडी का पहली कोशिश असफल रही। आइए जानते है पूरा किस्सा क्या है। कैसे सुल्ताना फ्रेडी के बिछाए जाल से बच निकला।

जब फ्रेडी-सुल्ताना को पकड़ने के लिए अपनी फोर्स में जाबांजो की भरती करने में लगा हुआ था सुल्ताना अपने गिरोह के साथ तराई और भाबर के इलाकों में छोटे-छोटे शहरों में डकैतियाँ डालने में मशगूल था।

फ्रेडी ने सुल्ताना को धर पकड़ने की पहली कोशिश रामनगर के जंगलों में की। वहाँ वन विभाग पेड़ कटवा रहा था और इस काम में बड़े पैमाने पर मजदूरों की फौज जुटी हुई थी। फ्रेडी ने मजदूरों के ठेकेदार से मुलाक़ात की और उसे आदेश दिया कि
एक रात वह जंगल में नाच-गाने का इंतज़ाम करे।
पुलिस की तरफ़ से निर्दिष्ट किया गया कि नाच-गाने का लुत्फ़ और चाहे जो उठाये ख़ास मेहमान की भूमिका में सुल्ताना और साथियों को आमंत्रित किया जाए। नाच के बाद दावत का इंतेजाम हो।
हैरत की बात ये की सुल्तान और उसके गिरोह ने खुशी-खुशी न्यौता स्वीकार कर लिया। बस उनकी एक शर्त थी, पहले खाना बाद में नाच। दलील ये दी गई कि खाली पेट के बजाय भरे पेट देखने के नाच का मजा दूना हो जाएगा। ठेकेदार के पास उनकी शर्त मनाने के सिवा कोई दूसरा चारा न था।
जलसे की रात ठेकेदार के मेहमान ठीक वक्त पर आ पहुँचे थे और खाने-पीने का दौर समय से शुरू हुआ। मेहमान जिस अंदाज में खा-पी रहे थे प्रफुल्लित दिख रहे थे उससे यही संकेत मिलता है कि ठेकेदार के दोस्तों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस मजमे में मेहमानों का दूसरा झुण्ड डकैतों का है।
बहरहाल सुल्ताना के गिरोह ने छक कर खाया-पिया और मेजबान को हौले से शुक्रिया अदा कर नौ दो ग्यारह। फ्रेडी ने जितना सोचा था सुल्ताना उससे अधिक चौकस खिलाड़ी निकला। उसने किसी गफ़लत में नहीं पूरे होशो हवास में निमंत्रण स्वीकार किया था। और ये जानते-बूझते आया था कि दावत की शक्ल में उसे कैद करने का जाल बिछाया गया है।
इसीलिए सुल्ताना और उसके गिरोह ने मजे से खाया-पिया और जब दावत खत्म हो रही थी तो सुल्ताना अपने मेजबान को एक तरफ ले गया। उसने मेहमानवाजी के लिए शुक्रिया अदा किया और कहा कि हमें अभी बहुत जाना है। इसलिए हम नाच के लिए रुक नहीं पाएँगे। जाने के पहले उसने एक ही दरख्वास्त और की, कि हमारे जाने के बाद नाच-गाना वैसे ही चलता रहे जैसे कि चलना चाहिए।
ठेकेदार को उसकी बात माननी ही थी जान का जोख़िम कौन ले। इस तरह फ्रेडी के मंसूबों ओर पानी फेरता वह रफ़ूचक्कर हो गया।सुल्ताना के मुखबिर पुलिस महकमे के मुखबिरों की तुलना में बीस निकले।
रामनगर के जंगलों से बच निकलने के बाद सुल्ताना ने पंजाब में कुछ डकैतियां डालीं। पंजाब में सुल्ताना ज्यादा नहीं रुका। कुछ लाख रुपये के जेवरात लूटने के बाद वह जल्दी ही वापस संयुक्त प्रांत लौट आया क्योंकि पंजाब में जंगल नहीं थे और बगैर जंगलों वाले मैदानी इलाके में सुल्ताना की स्थिति वैसी ही थी जैसा मछली पानी के बाहर महसूस करती है।
सुल्ताना को पकड़ पाने का फ्रेडी का पहला अभियान ज़रूर नाक़ामयाब रहा लेकिन वह अपने रसूख और रुतबे की वज़ह से सुल्ताना पर मानसिक दबाव बनाने में सफल रहा। सुल्ताना ने कुछ वक़्त के लिए अपना इलाका बदल लिया।
वह अपने गिरोह के साथ पूर्वी सरहद पर बसे पीलीभीत के जंगलों में चला गया था। पुलिसिया चौकसी बढ़ जाने से उसका गिरोह टूटने लगा था। उसके बहुत-से साथी गिरोह छोड़कर चले गए थे और कुछ पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे।
पीलीभीत इलाके में सुल्ताना कुछ महीने रहा और वहाँ रहते हुए दूर-दूर, यहाँ तक कि गोरखपुर में भी डकैतियाँ डालकर सोना लूटता रहा।
कुछ दिनों बाद वह वापस लौटा। रामनगर के जंगलों में दुबारा डेरा जमाने के बाद उसे जानकारी हुई कि रामपुर रियासत की रहने वाली एक बेहद अमीर तवायफ इन दिनों लमचौड़ के मुखिया के घर ठहरी हुई है।
लूटपाट का खतरा भांपते हुए मुखिया ने अपने घर पर तीस आदमी तैनात कर रखे थे। हालांकि इन आदमियों के पास हथियार नहीं थे। सुल्ताना ने मुखिया के घर धावा बोला और इसके पहले कि उसका गिरोह मकान की घेराबंदी कर पाता वह रईस तवायफ़ अपना माल मत्ता समेट पिछले दरवाज़े से निकल भागी।
सुल्ताना का असल मक़सद तो तवायफ़ की दौलत पर हाथ साफ़ करना था। उसके न मिलने से सारे डकैत खीझ गए। मुखिया के घर में मौजूद लोगों को मारने-कूटने से भी जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो वह ‘भागते भूत की लंगोट ही सही’ वाले अंदाज़ में मुखिया का घोड़ा लेकर भाग निकले। भागने से पहले प्रतिशोध लेने वाले अंदाज़ में मुखिया के एक स्वामिभक्त के सीने को गोली से छलनी करते गए।
इस वाकये के बाद जब फ्रेडी यंग ने सुल्ताना को धर-पकड़ने में जिम कॉर्बेट से सहयोग चाहा। जिम रामनगर और कालाढूंगी के जंगलों की ख़ाक छानकर वहाँ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ थे। उनका सहयोग अनमोल साबित हो सकता था। उन्होंने सहर्ष फ्रेडी को अपनी अनुमति दे दी।
(क्रमशः)
◆ नीलिमा पांडेय, लखनऊ।











